• 29 Mar, 2026

शिष्योंको शिक्षा-दान और स्वयं शिक्षा-ग्रहण

शिष्योंको शिक्षा-दान और स्वयं शिक्षा-ग्रहण

शिष्योंको शिक्षा-दान और स्वयं शिक्षा-ग्रहण

चतुर्दश अध्याय – शिष्यों को शिक्षा-दान और स्वयं शिक्षा-ग्रहण

श्रीरंगम स्थित अपने मठ में पहुँचकर यतिराज कुछ समय ठहरे। उस समय उनके प्रिय शिष्य श्रीकूरेश ने चरम श्लोक का अर्थ जानने के लिए प्रार्थना की। यतिराज ने उत्तर दिया कि — एक वर्ष तक बिना किसी अभिमान के, ब्रह्मचर्य-पालन और गुरु-सेवा में पूर्णतया निमग्न रहने पर ही मन्त्रार्थ का उपदेश दिया जाता है।

कूरेश की उत्कण्ठा और अनशन-व्रत

कूरेश ने विनम्र होकर कहा कि— *जीवन अस्थिर है, यह कैसे ज्ञात हो कि मैं एक वर्ष तक जीवित रहूँगा?* तब श्रीरामानुज ने शास्त्र से उपाय बताया कि *एक माह का अनशन-व्रत एक वर्ष के ब्रह्मचर्य-फल के समान माना गया है*। कूरेश ने वैसा ही किया और मास के अंत में उन्हें श्लोक-रहस्य प्रदान किया गया।

दाशरथि की परीक्षा – अभिमान का त्याग

दूसरे शिष्य दाशरथि ने भी रहस्यमय श्लोकार्थ जानने की इच्छा व्यक्त की। परन्तु यतिराज ने उन्हें श्रीगोष्ठीपूर्ण के पास भेजा क्योंकि दाशरथि पाण्डित्य के कारण कुछ अभिमान रखते थे।

छः महीने की परीक्षा

छः महीने तक दाशरथि जाते रहे, पर कृपा न मिली। अन्ततः महात्मा श्रीगोष्ठीपूर्ण ने कहा— *“विद्या, धन और कुल—इनसे मन में सूक्ष्म अभिमान रह जाता है। पहले गुरु के पास जाओ; वही तुम्हें रहस्य देंगे।”*

अतुला का प्रसंग – सेवा के द्वारा शुद्धि

उसी समय श्रीमहापूर्ण की कन्या अतुला एक समस्या लेकर आई। उसे प्रतिदिन दूर के तालाब से जल लाना पड़ता था और सास ने सहायता से इंकार कर दिया था। यतिराज ने समाधान कहा— *“एक ब्राह्मण तुम्हारे साथ जायेगा और सब कार्य करेगा।”* यह ब्राह्मण दाशरथि ही थे। उन्होंने आज्ञा का पालन किया और ससुराल में जाकर पाक-कार्य तथा जल-कार्य करने लगे।

दाशरथि की पहचान

एक दिन किसी वैष्णव द्वारा एक श्लोक की गलत व्याख्या सुनकर दाशरथि ने विनम्रता से सुधार किया। व्याख्या सुनकर सब आश्चर्यचकित रह गए। जब ज्ञात हुआ कि यह महान विद्वान यतिराज के प्रिय शिष्य दाशरथि हैं, तब सबने स्वयं उन्हें आदर सहित मठ में वापस पहुँचाया।

यतिराज ने उन्हें आलिंगन देकर आशीर्वाद दिया और रहस्यार्थ प्रदान किया। अब वे पूर्ण विनयवान हो चुके थे, इसी कारण उनका नाम पड़ा — वैष्णवदास

श्रीवररंग से ‘धर्म-रहस्य’ की शिक्षा

इसके बाद, श्रीमहापूर्ण की आज्ञा से श्रीरामानुज ने पुनः श्रीवररंग से द्राविड़ प्रबन्ध का अध्ययन आरम्भ किया। श्रीवररंग अत्यन्त संगीतप्रिय थे और प्रतिदिन भगवान के समक्ष नृत्य-गान करते थे।

सेवा के छह महीने

रात्रि में वे थक जाते, तब यतिराज स्वयं उनके पैर दबाते और अपने हाथ से बनाया हुआ दूध देते थे। छः महीनों के बाद वे अत्यन्त प्रसन्न हुए और बोले—

“वत्स! जो मैं कहता हूँ वही चरम पुरुषार्थ है — गुरुरेव परंब्रह्म, गुरुरेव परंधनम्; गुरुरेव परो कामो, गुरुरेव परायणम्… उपाय भी गुरु ही हैं और प्राप्य भी गुरु ही हैं।”

यह सुनकर यतिराज परमानन्द से भर गए। “गद्यत्रय” में उन्होंने इस दिव्य अनुभव का वर्णन किया है।

श्रीवररंग का परिवार और शिष्य-परम्परा

श्रीवररंग निःसंतान थे, पर उनका प्रिय छोटा भाई शोट्टनम्बि था। उसे भी उन्होंने श्रीरामानुज का शिष्य बना दिया। पाँच महात्मा— श्रीकाञ्चीपूर्ण, श्रीमहापूर्ण, श्रीगोष्ठीपूर्ण, श्रीमालाधर, श्रीवररंग — ये सभी श्रीयामुनाचार्य के अन्तःकरण शिष्य थे, और अब उनके पाँचों रहस्य श्रीरामानुज में एकत्र हो गए थे।

यतिराज की दिव्य विभूति

उनके दर्शन से ही सन्ताप दूर होता था। भगवद्साक्षात्कार की शक्ति, भक्तों को दुःख से उठाकर भगवान के चरणों तक पहुँचाने की क्षमता— यही कारण था कि वे “उभय-विभूति-पति” कहलाए।

Hari Krishna Regmi

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I am a writer and researcher dedicated to collecting and sharing Hindu stotra, rituals, festivals, and cultural wisdom. My work focuses on preserving and presenting authentic knowledge in a simple, meaningful way.