• 31 Mar, 2026

विशिष्टाद्वैत वेदांत के अनुसार जीव, प्रकृति और परब्रह्म के स्वरूप, कारण और परिणाम, जीवों का तिरोहित स्वरूप, तथा मोक्ष और भक्ति का मार्ग।

विशिष्टाद्वैत दर्शन – जीव, प्रकृति और परब्रह्म

जीव, प्रकृति और परब्रह्म के मूल तत्व

  1. चित् 'जीव' अचित् 'प्रकृति' का नाम जिसे कोई माया और कोई अविद्या भी कहते हैं, और ईश्वर ये तीन मूल तत्व हैं।
  2. ये तीनों तत्व सत्य हैं और साथ ही नित्य भी हैं।
  3. गोचर एवं अगोचर यावत् जगत्के जन्म, स्थिति और संहार आदि के कारण परब्रह्म हैं।
  4. ब्रह्म ही जगत का 'उपादान कारण' है तथा निमित्त कारण हैं। इसका दृष्टान्त है, मकड़ी से जाल की उत्पत्ति। नोट: समस्त कायों के दो कारण होते हैं:

    • उपादान कारण
    • निमित्त कारण

    यथा मिट्टी के घड़े का उपादान कारण मिट्टी है और निमित्त कारण कुम्हार हैं। 'अभिन्न' निमित्तोपादान कारण का दृष्टान्त है, जैसे मकड़ी अपने से ही सूत पैदा करती है, उससे जाल बनाती है। मकड़ी, सूत और जाल ये तीनों यथार्थ हैं।

  5. जीव, प्राकृतिक पंचभूतादि रूपी पदार्थ और इश्वर इन तीनों के समुदाय ही को ब्रह्म कहते हैं।
  6. परब्रह्म में कोई भी दुष्ट या हेय गुण नहीं है और वह सर्व-कल्याण 'शुभ' गुणों से परिपूर्ण है।
  7. परब्रह्म ज्ञानानन्द स्वरूप है। ज्ञान, शक्ति, बल, ऐश्वर्य, वीर्य, तेज आदि अनन्त गुणों का वह आश्रय स्थल है। वह सर्वज्ञ है, सर्वशक्तिमान है और सर्वव्यापी है।
  8. जीव भी ज्ञानानन्द स्वरूप है, ज्ञान गुणवान है और अनन्त है। उसका परिणाम अणु है।
  9. जीव अनादि, अविद्या, अज्ञान के कारण संचित पुण्य पाप रूप कर्मों के कारण प्रकृति सम्बन्ध, शारीरिक सम्बन्ध, रूप संसार को प्राप्त होते हैं। उनका स्वाभाविक स्वरूप आनन्दात्मक है। प्रकृति के सम्बन्ध से उसका यह स्वरूप तिरोहित आच्छादित है।
  10. प्रकृति त्रिगुणात्मिका अर्थात् सत्व, रज और तमोगुण-मयी है। यह सदा परिणाम को पहुँचाती रहती है। अनेक प्रकार के विकारों को यह प्रकृति उत्पन्न किया करती है। मूल प्रकृति एक और नित्या है।
  11. असत् अर्थात् अविद्यमान पदार्थ की उत्पत्ति नहीं होती। एक प्रकार की अवस्था से दूसरे प्रकार की अवस्था में जाना ही 'उत्पत्ति' है और उसे भी त्याग कर अवस्थान्तर की प्राप्ति 'नाश' कहलाता है। यही परिणामवाद कहलाता है। यथा मिट्टी जब पिंडावस्थायुक्त रहती है, तब वह पिंड कही जाती है, जब उसी पिंड को ठोंक-पीट कर घड़े के आकार का बना दिया जाता है, तब वही मिट्टी का घड़ा कहलाती है। जब घड़ा टूट-फूट गया, तब वह मिट्टी पूर्णावस्थाको प्राप्त होती है। मिट्टी एक ही है, रूपान्तर होने से उसके नामान्तर हो जाते हैं। इसी प्रकार अन्य भी समझना चाहिए।

कारणावस्था और कर्मावस्था

  1. सृष्टि के पूर्व प्रलयकाल में चित् 'जीव' और अचित् 'प्रकृति' दोनों ही सूक्ष्म अवस्था में रहते हैं। जैसे सृष्टि होने पर प्रकृति के पृथ्वी जल आदि नाना रूप होते हैं, वैसे प्रलयकाल में नहीं रहते। जीवों की स्थिति भी ऐसे ही समझनी चाहिए। इस सूक्ष्मावस्था को कारणावस्था कहते हैं। सृष्टिकाल में ये दोनों स्थूल अवस्था को प्राप्त करते हैं। स्थूल अवस्था को प्राप्त होना ही इनकी उत्पत्ति है और यही स्थूल अवस्था कार्यावस्था भी कहलाती है।
  2. परिणामशीला प्रकृति का सूक्ष्म अथवा स्थूल अवस्था को प्राप्त होना वैसा ही है जैसा मृत्तिका का पिंडत्वावस्था और घटत्वावस्था को प्राप्त होना। इसी बात को हम यों भी कह सकते हैं कि सूक्ष्मावस्थायुक्त प्रकृति स्थूल रूप में परिणत होती है। जीव स्वरूप परिणामरहित है। अतएव उसकी स्थूलावस्था और सूक्ष्मावस्था परिणाम के कारण नहीं होती, किन्तु प्रलय दशा में जीव प्राकृति शरीरादि शून्य होने के कारण, ज्ञान का विकास होता है। यह ज्ञान का संकोच और विकास ही जीव के सूक्ष्म और स्थूल अवस्था के कारण हैं। अर्थात् संकुचित ज्ञानवान होना सूक्ष्मावस्था और विकिसत ज्ञानवान होना स्थूलावस्था है। इन्हीं दो अवस्थाओं के कारण जीवों में उत्पत्ति और विनाश का व्यवहार किया जाता है, वास्तव में जीव स्वरूप तो नित्य निर्विकार है। आत्मा किसी भी अवस्था में बिना शरीर का नहीं रहता। मुक्तावस्था में भी भगवान की सेवा के लिए शुद्ध सत्व का बना हुआ अप्राकृतिक शरीर प्राप्त होता है।
  3. चिद्धिदात्मक यावत प्रपंच परब्रह्म के शरीरभूत हैं। जैसे पाँच भौतिक हस्तपदादि युक्त पिण्ड, जीव का शरीर है, वैसे ही चेतन अचेतन परब्रह्म के शरीर हैं। शरीर में जीव की सत्ता से जैसे शरीर की स्थिति है, वैसे ही चेतन और अचेतन पदार्थों में परमात्मा की सत्ता से उनकी स्थिति है। परब्रह्म सब पदार्थों के भीतर रहकर उनका नियमन धारण आदि करता है।
  4. 'उत्पत्ति' और 'नाश' अवस्था विशेष की प्राप्ति के नाम हैं। परब्रह्म में भी सृष्टि और प्रलय दशाओं में भिन्न-भिन्न अवस्थाएँ होती हैं। प्रलय दशा में परब्रह्म सूक्ष्म अवस्थायुक्त, प्रकृति और जीवों में अन्तर्यामी रहता है। सृष्टि दशा में स्थूल अवस्था से युक्त प्रकृति और जीवों में अन्तर्यामी रहता है। सूक्ष्मावस्था युक्त जीव 'चित्' और प्रकृति 'अचित्' के आत्मा होना एक अवस्था है और सूक्ष्मावस्थायुक्त जीव और प्रकृति के आत्मा होना दूसरी अवस्था है। इनमें पहली कारणावस्था और दूसरी कर्मावस्था है। उदाहरण: एक ही मृतिका पिंडावस्था से युक्त रहती हुई कारण और घटत्वावस्था से युक्त होकर कार्य कहलाती है। इसी प्रकार परब्रह्म भी ऊपर कही हुई पहली अवस्था से युक्त होकर रहने पर कारण और दूसरी अवस्था से युक्त होकर कार्य होता है। अतएव ब्रह्म ही जगत का कारण और ब्रह्म ही जगत है। 'अतः जगत् सत्य है मिथ्या नहीं।'
  5. स्थूल अवस्था से युक्त चित् "जीव" और अचित् जड़ पदार्थ प्रकृति ये दोनों परब्रह्म के शरीर हैं। अतः शरीर होने से ये परब्रह्म के विशेषण हैं। यहाँ पर इन दोनों पदार्थों का परब्रह्म के प्रति शरीर होना ही विशेषणत्व है। इन दोनों का परब्रह्म आत्मा है। अतएव इन दोनों विशेषणों से युक्त होना विशिष्टता भी कही जा सकती है। इसी से परब्रह्म चिचिद्विशिष्ट कहा जाता है। अथवा चित् 'जीव' और अचित् 'प्रकृति' के साथ अन्तरात्मा होकर सम्बन्ध रखना ही परब्रह्म में चिदचिद्वैशिष्ठिय है। परब्रह्म स्थूलावस्थायुक्त चिदचिद्विशिष्ट और सूक्ष्मावस्थायुक्त चिदचिद्विशिष्ट है। परब्रह्म एक है। अतएव यह सिद्ध होता है कि स्थूलावस्थायुक्त चिदचिद्विशिष्ट ब्रह्म और सूक्ष्मावस्थायुक्त चिदचिद्विशिष्ट ब्रह्म इन दोनों में अद्वैत अभेद है। यही विशिष्टाद्वैत शब्द का अर्थ है।
  6. देव मनुष्य आदि नाना शरीर में रहने पर भी जैसे जीवों से शरीरगत दोषों का सम्बन्ध नहीं होता, वैसे ही चिदचिदात्मक 'जीव और प्रकृति' समस्त प्रपंच परब्रह्म अन्तर्यामी रूप से रहने पर भी उनके 'जीव और जड़' दोषों से परब्रह्म का सम्बन्ध नहीं होता अर्थात् परब्रह्म पर उनके दोषों का प्रभाव नहीं पड़ता।
  7. जीवों के अनादि अविद्या से संचित कर्मों के सम्बन्ध में स्वाभाविक स्वरूप आच्छादित 'तिरोहित' है। कर्म सम्बन्ध से छुटकारा पाने पर स्वाभाविक स्वरूप का आविर्भाव होता है। ऐसा तभी होता जब जीव प्रकृति मंडल के बाहर जाता है। प्रकृति के पार जाकर अप्राकृतिक परम पद में पहुँचने से ही स्वाभाविक स्वरूप का आविर्भाव होता है और तभी परब्रह्म का अनुभव होता है। इस प्रकार प्रकृति मंडल के पार जाकर अप्राकृतिक लोक में पहुँच, स्वाभाविक स्वरूप का आविर्भाव होकर परब्रह्म अनुभव की प्राप्ति ही मोक्ष है। मुक्त जीव प्राकृतिक देह से रहित एवं शुद्ध सत्वमय अप्राकृतिक देह को पाकर नारायण के समान भोग प्राप्त कर रहे हैं। साथ ही वैकुण्ठ धाम में भगवान के चिरवास के रूप में अनन्त आनन्द का अनुभव करते हैं।
  8. मोक्ष की प्राप्ति का सर्वोत्कृष्ट उपाय भगवद्भक्ति है। जल तैल की धारा के समान अविछिन्न रूप से परब्रह्म का ध्यान किया जाय और वह ध्यान अनवरत भावना करने के कारण प्रत्यक्षवत् हो जाय तथा परब्रह्म में अत्यन्त अनुराग के कारण अत्यन्त प्रिय हो, वह 'भक्ति' कही जाती है। प्रतिदिन फल की कामना और कर्तव्य का त्याग कर वर्णाश्रमोचित नित्य नैमित्तिक कर्मों के अनुष्ठान करते हुये परम पुरुष के चरण युगल के ध्यान करने से भक्ति की सिद्धि हो जाती है। इसी भक्ति से परब्रह्म की प्राप्ति अर्थात् मोक्ष मिलती है।

विशिष्टाद्वैत, जीव, प्रकृति, परब्रह्म, मोक्ष, भक्ति, वेदांत, चित, अचित, ज्ञानानन्द, परिणामवाद, तिरोभाव, सृष्टि, प्रलय

Hari Krishna Regmi

Hari Krishna Regmi

I am a writer and researcher dedicated to collecting and sharing Hindu stotra, rituals, festivals, and cultural wisdom. My work focuses on preserving and presenting authentic knowledge in a simple, meaningful way.