• 31 Mar, 2026

षोड़श अध्याय – यज्ञमूर्ति

षोड़श अध्याय – यज्ञमूर्ति

षोड़श अध्याय – यज्ञमूर्ति

यज्ञमूर्ति नामक एक दिग्विजयी दाक्षिणात्य पण्डित आर्यावर्त्त के पण्डितों को परास्त करके अपने देश लौट रहे थे। भागीरथी के तट पर उन्होंने संन्यास ग्रहण किया था। जब उन्हें ज्ञात हुआ कि श्रीरामानुजाचार्य नामक एक वैष्णव संन्यासी मायावाद का खण्डन कर अपने सिद्धान्त का प्रचार कर रहा है, तब वे तुरंत श्रीरंगम् पहुँचे।

उनके पीछे पुस्तकों से भरा एक छकड़ा चलता था, क्योंकि वे हर स्थान पर अपनी समस्त पुस्तकें साथ रखते थे। यतिराज के सम्मुख पहुँचकर उन्होंने शास्त्रार्थ की भिक्षा माँगी।

शास्त्रार्थ का प्रारम्भ

श्रीरामानुज ने विनम्रतापूर्वक कहा— “महात्मन्! शास्त्रार्थ की क्या आवश्यकता है? मैं आपसे परास्त हूँ।”

यज्ञमूर्ति बोले— “यदि आप पराजय स्वीकार करते हैं, तो यह स्पष्ट है कि आपने भ्रान्त श्रीवैष्णव मत का त्याग कर अभ्रान्त मायावाद स्वीकार कर लिया है।”

यतिराज ने उत्तर दिया— “मायावादी ही तो भ्रान्ति-भ्रान्ति करते उन्मत्त होते हैं। उनके मत में तर्क, युक्ति—सब माया है। फिर उनका मत अभ्रान्त कैसे?”

इस प्रकार वाद आरम्भ हुआ और सत्रह दिनों तक चलता रहा। अन्तिम दिन यज्ञमूर्ति ने यतिराज की कई युक्तियों का खंडन कर दिया। इससे यतिराज विषण्ण होकर मठ लौट आए।

श्रीवरदराज के समक्ष प्रार्थना

वे मठस्थ श्रीवरदराज के सम्मुख हाथ जोड़कर बोले— “हे नाथ! वैष्णव शास्त्र पर मायावाद का मेघ छा गया है। मायावादी कूट-युक्ति से भोले जीवों को मोहित कर रहे हैं। आप कब तक अपनी सन्तान को अपने चरणों से दूर रखेंगे?”

यही कहकर वे अश्रुपात करने लगे। रात्रि में उन्हें देवराज का साक्षात्कार हुआ। देववाणी ने कहा—

“यतिराज! शोक मत करो। भक्तियोग का माहात्म्य तुम्हारे द्वारा शीघ्र प्रकाशित होगा। तुम्हें एक नवीन, प्रतिभाशाली शिष्य मिलेगा। अपने पराचार्य यामुनाचार्य के मायावाद-खण्डन ग्रन्थ के आधार पर कल वाद करो—विजय निश्चित है।”

अगले दिन का अद्भुत परिवर्तन

प्रातःकाल यतिराज के चेहरे पर दिव्य तेज फैल चुका था। वे यज्ञमूर्ति के समीप उपस्थित हुए। उनका अलौकिक रूप देखकर यज्ञमूर्ति चकित हो उठे।

वे मन में सोचने लगे— “कल इनका मुख मलिन था, आज ये देवतुल्य कैसे चमक रहे हैं? निश्चय ही देवबल प्राप्त हुआ है। अब ऐसे महापुरुष से शास्त्रार्थ करना व्यर्थ है। इनके चरणों में जाना ही कल्याण का मार्ग है।”

उनके हृदय में विनय उदित हुई। वे बोले—

“मैंने जीवन शुष्क शास्त्रार्थ में नष्ट किया। अहंकार बढ़ाया, चित्त मलिन किया। अब आपके शिष्य होकर इस पाप का प्रायश्चित करूँगा।”

यज्ञमूर्ति का आत्मसमर्पण

यज्ञमूर्ति ने यतिराज के चरण पकड़कर कहा— “प्रभो! मैं आपका शिष्य हूँ। कृपादृष्टि करें।”

यतिराज बोले—

“विद्या विनय देती है, किंतु यदि विद्या दम्भ बढ़ाए, तो वह अविद्या है। केवल भगवान की कृपा ही दाम्भिक हृदय को विनम्र कर सकती है। तुम बड़े भाग्यवान हो कि तुम्हें यह कृपा मिली।”

संस्कार एवं नामकरण

शास्त्र के अनुसार यज्ञोपवीत धारण करना उनका प्रथम कर्तव्य बताया गया। उन्होंने तुरंत यज्ञोपवीत धारण किया। यतिराज ने उन्हें ऊर्ध्वपुण्ड्र लगाया, शंख-चक्रांकित किया और उनका नाम रखा— देवराजमुनि

तत्पश्चात यतिराज ने कहा—

“वत्स, तुम्हारा पण्डित-हृदय आज अभिमान-मेघ से मुक्त है। अतः लोगों के कल्याणार्थ ग्रन्थ लिखो।”

देवराजमुनि ने द्राविड़ भाषा में दो महान ग्रन्थ लिखे—

  • ज्ञानसार
  • प्रमेयसार

श्रीरामानुज ने उनके निवास हेतु एक विशाल मठ भी बनवाया।

देवराजमुनि की विनयपूर्ण परीक्षा

कुछ दिनों बाद चार वैराग्यवान युवक श्रीरामानुज से दीक्षा हेतु आये। यतिराज ने कहा— “तुम देवराजमुनि के पास जाओ—वे ही तुम्हें शिष्य बनाएँगे।”

देवराजमुनि यह सुनकर व्याकुल हो उठे। वे यतिराज के पास आकर बोले—

“प्रभो! मैं तो अभी-अभी अभिमान से मुक्त हुआ हूँ। फिर ‘मैं गुरु हूँ’—यह अभिमान कैसे सहन कर पाऊँगा? कृपा कर मुझे इस बोझ से न दबाएँ।”

यतिराज प्रसन्न हुए। वे बोले—

“वत्स! यह तुम्हारी परीक्षा थी—तुम उत्तीर्ण हुए। तुम यहीं रहो और श्रीदेवराज की सेवा में जीवन व्यतीत करो।”

इस प्रकार देवराजमुनि और श्रीरामानुज दोनों ने अपना जीवन भगवद्सेवा और कैंकर्य में लगा दिया।

Hari Krishna Regmi

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I am a writer and researcher dedicated to collecting and sharing Hindu stotra, rituals, festivals, and cultural wisdom. My work focuses on preserving and presenting authentic knowledge in a simple, meaningful way.