त्रयोविंश अध्याय – धनुर्दास | श्रीरामानुजाचार्य जीवन कथा
धनुर्दास और उनकी पत्नी हेमाम्बा की भक्ति, श्रीरामानुजाचार्य की कृपा, गरुड़-महोत्सव में घटनाएँ, गुण और ब्राह्मण धर्म का महत्व।

गोविन्द का संन्यास — गोविन्द का गुरु-समर्पण, सेवाभाव, परीक्षाएँ, संन्यास-प्राप्ति और 'मन्नाथ' नामकरण का विस्तृत वर्णन। यह अध्याय भक्ति, त्याग और वैष्णव परम्परा की प्रेरक कथा प्रस्तुत करता है।
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श्रीशैलपूर्ण के आचार-वचन से गोविन्द को कोई कष्ट न हुआ; परन्तु उसने यह समझ लिया कि श्रीरामानुज के चरणों में संपूर्ण भाव से समर्पण करना ही उसके आचरण का उद्देश्य है। तत्पश्चात् वह यतिराज के काय, मन और वचन से सेवा करने लगा। कुछ ही दिनों में उसने अपने नवीन प्रभु की समस्त आवश्यकताएँ समझ लीं और कहे जाने से पहले ही कार्य सम्पन्न कर दिया करने लगा। अन्य शिष्य इस निपुणता देखकर चकित रह जाते थे।
एक बार अन्य शिष्यों ने गोविन्द की सेवा-निपुणता की प्रशंसा की। वह सुनकर गोविन्द ने कहा— “हाँ, हमारे गुण प्रशंसा के योग्य हैं ही।” यह शब्द सुन प्रशंसा करनेवालों ने यतिराज को सूचित किया। उन्होंने गोविन्द को बुलाकर पूछा—“वत्स! जब तेरे गुणों की प्रशंसा हो रही है, तब क्या तुझे अहंकार उत्पन्न होना चाहिए?” गोविन्द ने उत्तर दिया कि वह तो नानावर्षियों के भ्रमण के बाद विरले जन मिले इस मानव-देह का भागी है; उसमें जो भी सद्गुण दिखते हैं वे सर्वथा गुरु की कृपा से हैं—स्वयं तो वह जड़बुद्धि और हीन प्रकृति का जीव है। यह उत्तर सुन सभी धन्य और चकित हो गए।
एक अन्य अवसर पर गोविन्द बिना प्रातःकृत्व किए ही किसी वेश्या के द्वार पर बैठा मिला। शिष्यों ने यतिराज से पूछा कि ऐसा आचरण क्यों। गोविन्द ने कहा कि वह स्त्री बहुत मधुर स्वर में आपके गुणगान कर रही थी; वह पारायण की इच्छा से अंत तक बैठकर सुनता रहा, इसलिए प्रातःकृति नहीं कर पाया। सभी उसकी सरलता और स्वाभाविक भक्तिमयता पर मुग्ध हो उठे।
इसी बीच श्रीशैलपूर्ण की भगिनी और गोविन्द की माता ने यतिराज से कहा कि गोविन्द की पत्नी ऋतुमती हुई है; अतः उसे अपनी पत्नी की धर्मरक्षा करने की आज्ञा दें। पहले उन्हें कहा गया था कि जब अवसर मिले तब एकान्त में पत्नी को लाओ; पर गोविन्द सदैव कार्यों में लगे रहने से अवसर नहीं देता। इस पर यतिराज ने गोविन्द को बुलाकर कहा— “वत्स, तमोगुण त्याग कर पत्नी के साथ सयन कर।” गोविन्द ने गुरु आज्ञा स्वीकार कर वह रात्रि पत्नी के साथ व्यतीत की।
गोविन्द की माता ने गुरु को सब बात बताई। यतिराज ने पूछा कि आज्ञा का पालन क्यों नहीं हुआ। गोविन्द ने कहा— “महात्मन्! आपने तमोगुण त्यागकर भार्या के साथ रहने का आदेश दिया था; मैंने उसी अनुसार आचरण किया। तमोगुण छूटते ही अन्तर्यामी पुरुष का प्रकाश प्रकट होता है—उस प्रकाश के सामने काम आदि ठहर ही नहीं सकते।” यह सुनकर यतिराज ने कुछ समय चुप्पी के बाद कहा—“यदि तेरा मन ऐसा है तो तू संन्यासी बना; आश्रम में रहकर आश्रमोचित धर्म पालन करना शास्त्र की आज्ञा है। यदि तू इन्द्रियों को वश में कर सकता है तो संन्यास ही तुझ पर उत्तम शोभा पाएगा।”
यह कथन सुन गोविन्द अत्यन्त प्रसन्न हुआ और उसने कहा कि वह तत्पर है। यतिराज ने गोविन्द की माता से अनुमति लेकर उसे दण्ड-कमण्डल देकर परमहंस पद प्रदान किया। नवीन संन्यासी की दिव्य कान्ति, ज्ञानसमुद्भासित मुखमण्डल, प्रेमाश्रु से भरे नेत्र और भक्तिमय देह देखकर यतिराज ने उसका नाम “मन्नाथ” रखा।
यह नाम यतिराज की अप्रत्याशित अनुकम्पा से दिया गया; पर मन्नाथ (तामिल अनुवाद: ஏம் பெருமாந்ற்) का भाव पुराने और शेषांशों को एकत्रित कर एक पवित्र पद रचना जैसा था। गोविन्द, अब मन्नाथ, अहंकार-विहीन, सत्त्व-रूप, प्रभात-सूर्य के समान कान्तिशील और बालसदृश प्रेम-स्वभाव वाले संन्यासी बने—शुद्ध दास्य-भक्ति के आदर्श। उन्होंने कभी भी अपने प्रभु के नाम से अभिहित होना स्वीकार नहीं किया; उनका समर्पण निःस्वार्थ एवं परिपूर्ण था।
श्रीरंगम के मठ में श्रीरामानुज के कई हजार शिष्य थे, जिनमें सड़सठ अथवा छियासठ (64) प्रधान शिष्य प्रमुख थे। ये सब विद्वान्, त्यागी और परम भक्तिमान थे। पूरा समग्र वेद और द्राविड़ प्रबन्धमाला उन्हें कण्ठस्थ थी। इन प्रमुख शिष्यों में पहले से उल्लेखित दाशरथि, कूरेश, सुन्दरबाहु, शोदैनाम्बि, सौम्य नारायण, यज्ञमूर्ति, गोविन्द आदिपरिवार थे। इन सब के साथ श्रीरामानुज भक्ति-तत्व-व्याख्या और शास्त्रालाप में आनंदपूर्वक समय व्यतीत करते रहे।
I am a writer and researcher dedicated to collecting and sharing Hindu stotra, rituals, festivals, and cultural wisdom. My work focuses on preserving and presenting authentic knowledge in a simple, meaningful way.
धनुर्दास और उनकी पत्नी हेमाम्बा की भक्ति, श्रीरामानुजाचार्य की कृपा, गरुड़-महोत्सव में घटनाएँ, गुण और ब्राह्मण धर्म का महत्व।
विशिष्टाद्वैत वेदांत के अनुसार जीव, प्रकृति और परब्रह्म के स्वरूप, कारण और परिणाम, जीवों का तिरोहित स्वरूप, तथा मोक्ष और भक्ति का मार्ग।
श्रीरामानुजाचार्य द्वारा रचित प्रमुख ग्रन्थों का परिचय एवं विवरण। वेदार्थ संग्रह, वेदान्तसार, वेदान्त दीप, श्रीभाष्य, गीता भाष्य, गद्यत्रय, नित्याराधन।
