• 29 Mar, 2026

एकविंश अध्याय – दिग्विजय | श्री रामानुजाचार्य जीवन कथा

एकविंश अध्याय – दिग्विजय | श्री रामानुजाचार्य जीवन कथा

श्रीरामानुजाचार्य का दिग्विजय, दक्षिण और उत्तर भारत की यात्रा, शास्त्रार्थों में विजय, शारदा पीठ का दर्शन, श्रीभाष्य का प्रचार, श्रीजगन्नाथपुरी और वेंकटाचल यात्रा का विस्तृत वर्णन।

एकविंश अध्याय – दिग्विजय

दिग्विजय की शुरुआत और दक्षिण की यात्रा

श्रीरामानुजाचार्य ने अपने शिष्यों सहित श्रीभाष्य और अन्य ग्रंथों की रचना समाप्त करने के पश्चात् चौहत्तर सिंहासनाधिपतियों तथा अनेक शिष्यों के साथ दिग्विजय हेतु यात्रा प्रारम्भ की। वे पहले चोलमण्डल की राजधानी पहुँचे और फिर कुम्भकोणम् गये।

कुम्भकोणम् के पण्डितों को शास्त्रार्थ में परास्त करके अपने मत में दीक्षित करने के पश्चात् यात्रा पाण्ड्यदेश की राजधानी मदुरा में हुई। यह नगर द्राविड़ कवियों का दुर्बेद्य किला था। 'द्राविड़ प्रबन्धमाला' की व्याख्या करके उन्होंने वहाँ के पण्डितों को भी अपने मत में प्रविष्ट किया।

दर्शनों और भक्तिपूर्वक मण्डलों की यात्रा

यतिराज ने शठारिकी जन्मभूमि कुरुकापुरी जाकर देवमन्दिर में शठारिकी मूर्ति का दर्शन किया और स्तुति करके आनंदित हुए। फिर करङ्ग नगरी के विष्णु का दर्शन करके उनका हृदय अभिभूत हुआ। यात्रा के दौरान गुरु ने वहाँ के भगवान् को शिष्यत्व ग्रहण करने के लिए प्रेरित किया और उनका नाम वैष्णवानाम्बि रखा।

इसके पश्चात् केरल (मलाबार) के तिरुअनन्तपुरम् या त्रिवेन्द्रम में अनन्तशयन पद्मनाभ का दर्शन किया। उत्तर की ओर यात्रा में वे क्रमशः द्वारावती, मथुरा, वृन्दावन, शालग्राम, साकेत, बदरिकाश्रम, नैमिषारण्य और पुष्कर शादिका पहुँचे। अन्ततः काश्मीर शारदापीठ में जाकर शारदा देवी से 'कप्यातं पुण्डरीकाक्षम्' की व्याख्या करवाई और 'भाष्यकार' की उपाधि प्राप्त की।

काश्मीरी पण्डितों के शास्त्रार्थ और अभिचार

कश्मीर के पण्डितों ने शास्त्रार्थ किया और अंततः यतिराज के प्राण नाश हेतु अभिचार किया। परन्तु फल उलटा हुआ और अभिचार करने वाले स्वयं प्राण त्यागने पर मजबूर हुए। राजा और पण्डित उनके शिष्य बने और यतिराज ने वहाँ हयग्रीव मूर्ति का दर्शन किया। शारदा देवी से आज्ञा लेकर उन्होंने काशी की यात्रा की और वहाँ के दार्शनिक पण्डितों को अपने मत में दीक्षित किया।

श्रीजगन्नाथपुरी की यात्रा

श्रीपुरुषोत्तम क्षेत्र श्रीजगन्नाथपुरी में यतिराज ने मठ बनवाया और वहाँ अपने सिद्धान्त का प्रचार किया। पण्डितों ने परास्त होने के भय से शास्त्रार्थ नहीं किया। यतिराज ने पञ्चरात्र-विधान अनुसार पूजा हेतु पुजारियों से अनुरोध किया। श्रीजगन्नाथ की माया से वे सौ योजन दूर कूर्मक्षेत्र पहुँच गए।

सिंहाचल और वेंकटाचल की यात्रा

कूर्मदेव के मन्दिर में बड़ी भक्तिसे पूजा करने के पश्चात् वे शिष्यों से पुनः मिलित हुए और सिंहाचल गए। वहाँ कुछ दिनों तक ठहरकर अहोवल मन्दिर और फिर वेंकटाचल पहुँचे। इस समय वैष्णव और शैव सम्प्रदायों में भगवान के विग्रह को लेकर शास्त्रार्थ हो रहा था। यतिराज ने अपनी अलौकिक शक्ति द्वारा यह प्रदर्शित किया कि यह केवल विष्णु विग्रह हो सकता है।

काञ्चीपुर की वापसी

कुछ दिनों तक वहाँ रहने के पश्चात् श्रीरामानुज अपने शिष्यों सहित काञ्चीपुर लौट आए। श्रीवरदराज भगवान् का दर्शन कर उन्होंने अपने आपको कृतार्थ समझा। मदुरान्तक का दर्शन करने के बाद वे श्रीयामुनमुनिके पितामह नाथमुनि की जन्मभूमि वीर-नारायणपुर पहुँचे और महायोगाभ्यास स्थान पर प्रणाम किया। अन्ततः वे श्रीरंगम् आए और श्रीरंगनाथ स्वामी का दर्शन करके अत्यन्त भाग्यवान् महसूस किया।

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Hari Krishna Regmi

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I am a writer and researcher dedicated to collecting and sharing Hindu stotra, rituals, festivals, and cultural wisdom. My work focuses on preserving and presenting authentic knowledge in a simple, meaningful way.