• 29 Mar, 2026

धर्मात्मा-जनका दिव्यलोकोंका सुख भोगकर उत्तम कुलमें जन्म लेना, शरीरके व्यावहारिक तथा पारमार्थिक दो रूपोंका वर्णन, अजपाजपकी विधि, भगवत्प्राप्तिके साधनोंमें भक्तियोगकी प्रधानता

गरुडपुराण सारोद्धार – सुकृतिजनजन्माचरणनिरूपण

Table of contents [Show]

धर्मात्मा जीव का पुनर्जन्म

गरुडजीने कहा-धर्मात्मा व्यक्ति स्वर्गके भोगोंको भोगकर पुनः निर्मल कुलमें उत्पन्न होता है, इसलिये माताके गर्भमें उसकी उत्पत्ति कैसे होती है, इस विषयमें बताइये॥१॥

हे करुणानिधे! पुण्यात्मा पुरुष इस देहके विषयमें जिस प्रकार विचार करता है, वह मैं सुनना चाहता हूँ, मुझे बताइये ॥२॥

भगवान द्वारा पारमार्थिक रहस्य का वर्णन

श्रीभगवान्ने कहा-हे तार्थ्य! तुमने ठीक पूछा है, मैं तुम्हें परम गोपनीय बात बताता हूँ जिसे जान लेनेमात्रसे मनुष्य सर्वज्ञ हो जाता है॥३॥

(पहले) मैं तुम्हें शरीरके पारमार्थिक स्वरूपके विषयमें बतलाता हूँ, जो ब्रह्माण्डके गुणोंसे सम्पन्न है और योगियोंके द्वारा धारण करनेयोग्य है॥४॥

षट्चक्र और ब्रह्म ध्यान का वर्णन

इस पारमार्थिक शरीरमें जिस प्रकार योगीलोग षट्चक्रका चिन्तन करते हैं और ब्रह्मरन्ध्रमें सच्चिदानन्दस्वरूप ब्रह्मका ध्यान करते हैं, वह सब मुझसे सुनो॥५॥

पुण्यात्मा जीव का गर्भ में प्रवेश

पुण्यात्मा जीव पवित्र आचरण करनेवाले लक्ष्मीसम्पन्न गृहस्थोंके घरमें जैसे उत्पन्न होता है तथा उसके माता-पिता के नियम-विधान जैसे होते हैं, उनके विषय में बताता हूँ॥६॥

ऋतुकाल और गर्भाधान के नियम

स्त्रियोंके ऋतुकालमें चार दिनतक उनका त्याग कर देना चाहिये। उतने समयतक उनका मुख भी नहीं देखना चाहिये; क्योंकि उस समय उनके शरीरमें पापका निवास रहता है॥७॥

चौथे दिन स्नान के पश्चात् स्त्री शुद्ध होती है और एक सप्ताह के बाद देव-पितृ पूजन के योग्य होती है॥८॥

ऋतुकाल में गर्भाधान से संतान के गुणों का निर्धारण होता है। युग्म रात्रियों में पुत्र और विषम रात्रियों में कन्या उत्पन्न होती है॥९–१०॥

शुद्ध आहार और गर्भ क्षेत्र की पवित्रता

पाँचवें दिन मधुर भोजन करना चाहिये और तीखे, खारे, कडुए भोजन से बचना चाहिये॥१३॥

ऐसे शुद्ध क्षेत्र में स्थापित बीज अमृत के समान सुरक्षित रहता है और उत्तम संतान प्रदान करता है॥१४॥

गर्भाधान के समय पुरुष की मनोवृत्ति

गर्भाधान के समय पुरुष जैसी भावना रखता है, उसी प्रकार का स्वभाव वाला जीव गर्भ में प्रवेश करता है॥१६॥

जीव, शुक्र और शोणित का संयोग

शुक्र और शोणित के संयोग से गर्भपिण्ड की उत्पत्ति होती है और पुण्यात्मा पुत्र माता-पिता को आनन्द प्रदान करता है॥१७–१९॥

पुण्यात्मा पुत्र के लक्षण

ऐसा पुत्र विद्या, विनय, दानशीलता से युक्त होता है और शास्त्रों में पारंगत बनता है॥२०–२२॥

आत्मज्ञान और ब्रह्मबोध

वह आत्मा और अनात्मा का विवेक कर रस्सी-सर्प के दृष्टान्त द्वारा ब्रह्म सत्य का बोध करता है॥२३॥

पंचमहाभूत और शरीर की रचना

पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश – ये पंचमहाभूत शरीर के आधार हैं॥२५॥

इन्द्रियाँ, नाड़ियाँ और प्राणवायु

श्रोत्र, त्वचा, जिह्वा, नेत्र और नासिका ज्ञानेन्द्रियाँ हैं तथा दस प्राणवायु शरीर में कार्यरत रहती हैं॥३१–३७॥

व्यावहारिक और पारमार्थिक शरीर

नरदेह के दो रूप हैं – एक व्यावहारिक और दूसरा पारमार्थिक, जिसमें सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड स्थित है॥४६–५४॥

चौदह लोकों का शरीर में स्थान

नाभि में भूर्लोक, हृदय में स्वर्लोक और ब्रह्मरन्ध्र में सत्यलोक स्थित है॥५८–५९॥

षट्चक्र साधना और अजपा जप

मूलाधार से सहस्रार तक षट्चक्रों का ध्यान कर अजपा गायत्री का जप करना चाहिये॥६९–७५॥

हंस मंत्र और श्वास-जप

'हं' और 'सः' के जप से जीव निरन्तर परमात्मा का स्मरण करता है॥७७–७८॥

गुरु ध्यान और कुण्डलिनी साधना

गुरु के उपदेश से सहस्रार में स्थित ब्रह्म का ध्यान कर कुण्डलिनी जाग्रत करनी चाहिये॥८४–८७॥

भक्ति मार्ग की महिमा

देहाभिमानी व्यक्ति के लिये सरल भक्ति मार्ग ही मोक्ष का सर्वोत्तम साधन है॥९१–९२॥

मोक्ष की सिद्धि

जो मनुष्य इस प्रकार आचरण करता है, वह सनातन मोक्ष पद को प्राप्त करता है॥९५॥

अध्याय समाप्ति

॥ इस प्रकार गरुडपुराण के अन्तर्गत सारोद्धार में 'सुकृतिजनजन्माचरणनिरूपण' अध्याय पूर्ण हुआ ॥

Hari Krishna Regmi

Hari Krishna Regmi

I am a writer and researcher dedicated to collecting and sharing Hindu stotra, rituals, festivals, and cultural wisdom. My work focuses on preserving and presenting authentic knowledge in a simple, meaningful way.