तेरहवाँ अध्याय गरुडपुराण (सारोद्धार) – सपिण्डन विधि, सूतक निर्णय एवं शय्यादान
अशौचकालका निर्णय, अशौचमें निषिद्ध कर्म, सपिण्डीकरणश्राद्ध, पिण्डमेलनकी प्रक्रिया, शय्यादान, पददान तथा गयाश्राद्धकी महिमा
धर्मात्मा-जनका दिव्यलोकोंका सुख भोगकर उत्तम कुलमें जन्म लेना, शरीरके व्यावहारिक तथा पारमार्थिक दो रूपोंका वर्णन, अजपाजपकी विधि, भगवत्प्राप्तिके साधनोंमें भक्तियोगकी प्रधानता
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गरुडजीने कहा-धर्मात्मा व्यक्ति स्वर्गके भोगोंको भोगकर पुनः निर्मल कुलमें उत्पन्न होता है, इसलिये माताके गर्भमें उसकी उत्पत्ति कैसे होती है, इस विषयमें बताइये॥१॥
हे करुणानिधे! पुण्यात्मा पुरुष इस देहके विषयमें जिस प्रकार विचार करता है, वह मैं सुनना चाहता हूँ, मुझे बताइये ॥२॥
श्रीभगवान्ने कहा-हे तार्थ्य! तुमने ठीक पूछा है, मैं तुम्हें परम गोपनीय बात बताता हूँ जिसे जान लेनेमात्रसे मनुष्य सर्वज्ञ हो जाता है॥३॥
(पहले) मैं तुम्हें शरीरके पारमार्थिक स्वरूपके विषयमें बतलाता हूँ, जो ब्रह्माण्डके गुणोंसे सम्पन्न है और योगियोंके द्वारा धारण करनेयोग्य है॥४॥
इस पारमार्थिक शरीरमें जिस प्रकार योगीलोग षट्चक्रका चिन्तन करते हैं और ब्रह्मरन्ध्रमें सच्चिदानन्दस्वरूप ब्रह्मका ध्यान करते हैं, वह सब मुझसे सुनो॥५॥
पुण्यात्मा जीव पवित्र आचरण करनेवाले लक्ष्मीसम्पन्न गृहस्थोंके घरमें जैसे उत्पन्न होता है तथा उसके माता-पिता के नियम-विधान जैसे होते हैं, उनके विषय में बताता हूँ॥६॥
स्त्रियोंके ऋतुकालमें चार दिनतक उनका त्याग कर देना चाहिये। उतने समयतक उनका मुख भी नहीं देखना चाहिये; क्योंकि उस समय उनके शरीरमें पापका निवास रहता है॥७॥
चौथे दिन स्नान के पश्चात् स्त्री शुद्ध होती है और एक सप्ताह के बाद देव-पितृ पूजन के योग्य होती है॥८॥
ऋतुकाल में गर्भाधान से संतान के गुणों का निर्धारण होता है। युग्म रात्रियों में पुत्र और विषम रात्रियों में कन्या उत्पन्न होती है॥९–१०॥
पाँचवें दिन मधुर भोजन करना चाहिये और तीखे, खारे, कडुए भोजन से बचना चाहिये॥१३॥
ऐसे शुद्ध क्षेत्र में स्थापित बीज अमृत के समान सुरक्षित रहता है और उत्तम संतान प्रदान करता है॥१४॥
गर्भाधान के समय पुरुष जैसी भावना रखता है, उसी प्रकार का स्वभाव वाला जीव गर्भ में प्रवेश करता है॥१६॥
शुक्र और शोणित के संयोग से गर्भपिण्ड की उत्पत्ति होती है और पुण्यात्मा पुत्र माता-पिता को आनन्द प्रदान करता है॥१७–१९॥
ऐसा पुत्र विद्या, विनय, दानशीलता से युक्त होता है और शास्त्रों में पारंगत बनता है॥२०–२२॥
वह आत्मा और अनात्मा का विवेक कर रस्सी-सर्प के दृष्टान्त द्वारा ब्रह्म सत्य का बोध करता है॥२३॥
पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश – ये पंचमहाभूत शरीर के आधार हैं॥२५॥
श्रोत्र, त्वचा, जिह्वा, नेत्र और नासिका ज्ञानेन्द्रियाँ हैं तथा दस प्राणवायु शरीर में कार्यरत रहती हैं॥३१–३७॥
नरदेह के दो रूप हैं – एक व्यावहारिक और दूसरा पारमार्थिक, जिसमें सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड स्थित है॥४६–५४॥
नाभि में भूर्लोक, हृदय में स्वर्लोक और ब्रह्मरन्ध्र में सत्यलोक स्थित है॥५८–५९॥
मूलाधार से सहस्रार तक षट्चक्रों का ध्यान कर अजपा गायत्री का जप करना चाहिये॥६९–७५॥
'हं' और 'सः' के जप से जीव निरन्तर परमात्मा का स्मरण करता है॥७७–७८॥
गुरु के उपदेश से सहस्रार में स्थित ब्रह्म का ध्यान कर कुण्डलिनी जाग्रत करनी चाहिये॥८४–८७॥
देहाभिमानी व्यक्ति के लिये सरल भक्ति मार्ग ही मोक्ष का सर्वोत्तम साधन है॥९१–९२॥
जो मनुष्य इस प्रकार आचरण करता है, वह सनातन मोक्ष पद को प्राप्त करता है॥९५॥
॥ इस प्रकार गरुडपुराण के अन्तर्गत सारोद्धार में 'सुकृतिजनजन्माचरणनिरूपण' अध्याय पूर्ण हुआ ॥
I am a writer and researcher dedicated to collecting and sharing Hindu stotra, rituals, festivals, and cultural wisdom. My work focuses on preserving and presenting authentic knowledge in a simple, meaningful way.
अशौचकालका निर्णय, अशौचमें निषिद्ध कर्म, सपिण्डीकरणश्राद्ध, पिण्डमेलनकी प्रक्रिया, शय्यादान, पददान तथा गयाश्राद्धकी महिमा
यमलोक एवं यम-सभाका वर्णन, चित्रगुप्त आदिके भवनोंका परिचय,धर्मराजनगरके चार द्वार, पुण्यात्माओंका धर्मसभामें प्रवेश
मनुष्य-शरीर प्राप्त करनेकी महिमा, धर्माचरण ही मुख्य कर्तव्य, शरीर और संसारकी दुःखरूपता तथा नश्वरता, मोक्ष-धर्म-निरूपण
