चौदहवाँ अध्याय गरुडपुराण (सारोद्धार) – धर्मराज नगर निरूपण
यमलोक एवं यम-सभाका वर्णन, चित्रगुप्त आदिके भवनोंका परिचय,धर्मराजनगरके चार द्वार, पुण्यात्माओंका धर्मसभामें प्रवेश
अशौचकालका निर्णय, अशौचमें निषिद्ध कर्म, सपिण्डीकरणश्राद्ध, पिण्डमेलनकी प्रक्रिया, शय्यादान, पददान तथा गयाश्राद्धकी महिमा
← Previous Chapter: एकादशाह विधि एवं वृषोत्सर्ग विधान (अध्याय 12)
Table of contents [Show]
गरुडजीने कहा-हे प्रभो! सपिण्डनकी विधि, सूतकका निर्णय और शय्यादान तथा पददानकी सामग्री एवं उनकी महिमाके विषयमें कहिये ॥१॥
श्रीभगवान्ने कहा-हे तार्थ्य! सपिण्डीकरण आदि सम्पूर्ण क्रियाओंके विषयमें बतलाता हूँ, जिसके द्वारा मृत प्राणी प्रेत नामको छोड़कर पितृगणमें प्रवेश करता है, उसे सुनो॥ २॥
जिनका पिण्ड रुद्रस्वरूप पितामह आदिके पिण्डोंमें नहीं मिला दिया जाता, उनको पुत्रोंके द्वारा दिये गये अनेक प्रकारके दान प्राप्त नहीं होते॥३॥
उनका पुत्र भी सदा अशुद्ध रहता है कभी शुद्ध नहीं होता; क्योंकि सपिण्डीकरणके बिना सूतककी निवृत्ति (समाप्ति) नहीं होती॥४॥
ब्राह्मण दस दिनमें, क्षत्रिय बारह दिनमें, वैश्य पंद्रह दिन और शूद्र एक मासमें शुद्ध होता है॥६॥
प्रेतसम्बन्धी सूतक (मृताशौच)-में सपिण्डी दस दिनमें शुद्ध होते हैं। सकुल्या (कुलके लोग) तीन रातमें शुद्ध होते हैं और गोत्रज स्नानमात्रसे शुद्ध हो जाते हैं ॥७॥
कलियुगमें जननाशौच और मरणाशौचसे सभी वर्गों की दस दिनमें शुद्धि हो जाती है, ऐसा शास्त्रका निर्णय है ॥ १९॥
तत्त्वदर्शी मुनियोंने बारहवें दिन, तीन पक्षमें, छः मासमें अथवा एक वर्ष पूर्ण होनेपर सपिण्डीकरण कहा है॥२८॥
हे तार्थ्य! मैं तो शास्त्रधर्मके अनुसार चारों वर्गों के लिये बारहवें दिन ही सपिण्डीकरण करनेके लिये कहता हूँ॥ २९ ॥
तब वसु, रुद्र और आदित्यस्वरूप पिता, पितामह तथा प्रपितामहको क्रमशः एक-एक अर्थात् तीन पिण्ड प्रदान करे और चौथा पिण्ड मृतकको प्रदान करे ॥ ३७॥
इस प्रकार सपिण्डन-श्राद्ध करके क्रिया करते समय पहने गये वस्त्रोंका त्याग कर दे। इसके बाद श्वेतवर्णके वस्त्रको धारण करके शय्यादान करे॥५८॥
इन्द्रसहित सभी देवता शय्यादानकी प्रशंसा करते हैं, अतः मृतकके उद्देश्यसे उसकी मृत्युके बाद अथवा जीवनकालमें भी शय्या प्रदान करनी चाहिये॥ ५९॥
सभी तीर्थोंमें तथा सभी पर्वदिनोंमें जो भी पुण्यकार्य किये जाते हैं, उन सभीसे अधिक पुण्य शय्यादानके द्वारा प्राप्त होता है॥ ८१॥
छत्र (छाता), उपानह (जूता), वस्त्र, मुद्रिका (अँगूठी), कमण्डलु, आसन तथा पंचपात्र-ये सात वस्तुएँ पद कही गयी हैं ॥८३ ॥
इस पददानसे धार्मिक पुरुष सद्गतिको प्राप्त होते हैं। यममार्गमें गये हुए जीवोंके लिये पददान सुख प्रदान करनेवाला होता है॥८६॥
हे खगेश्वर! पितृभक्तिसे प्रेरित हो करके पुत्रको एक वर्षके अनन्तर ही गयाश्राद्ध करना चाहिये ॥ १०९ ॥
गयाश्राद्ध करनेसे पितर भवसागरसे मुक्त हो जाते हैं और भगवान् गदाधरकी कृपासे वे परम गतिको प्राप्त होते हैं ॥ ११० ॥
जो मनुष्य मेरे द्वारा कहे गये श्राद्धों एवं दानोंको विधिपूर्वक करता है ओर गरुडपुराणकी कथाको सुनता है, उसके फलको सुनो- ॥ १२३ ॥
सूतजीने कहा-इस प्रकार श्रीविष्णुजीसे और्ध्वदैहिक श्राद्ध-दानादिविषयक माहात्म्य सुनकर गरुडजीको अपार हर्ष हुआ॥ १२७॥
॥ इस प्रकार गरुडपुराणके अन्तर्गत सारोद्धारमें 'सपिण्डनादि-सर्वकर्मनिरूपण' नामक तेरहवाँ अध्याय पूरा हुआ॥१३॥
गरुडपुराण, श्राद्ध विधि, धर्म एवं संस्कृत ज्ञान को सरल रूप में पढ़ने के लिए Guru Parampara App डाउनलोड करें
I am a writer and researcher dedicated to collecting and sharing Hindu stotra, rituals, festivals, and cultural wisdom. My work focuses on preserving and presenting authentic knowledge in a simple, meaningful way.
यमलोक एवं यम-सभाका वर्णन, चित्रगुप्त आदिके भवनोंका परिचय,धर्मराजनगरके चार द्वार, पुण्यात्माओंका धर्मसभामें प्रवेश
धर्मात्मा-जनका दिव्यलोकोंका सुख भोगकर उत्तम कुलमें जन्म लेना, शरीरके व्यावहारिक तथा पारमार्थिक दो रूपोंका वर्णन, अजपाजपकी विधि, भगवत्प्राप्तिके साधनोंमें भक्तियोगकी प्रधानता
मनुष्य-शरीर प्राप्त करनेकी महिमा, धर्माचरण ही मुख्य कर्तव्य, शरीर और संसारकी दुःखरूपता तथा नश्वरता, मोक्ष-धर्म-निरूपण
