द्वादशदिव्य सूरी और दस पूर्वाचार्य
द्वादश दिव्य सूरी और दस पूर्वाचार्यों के नाम और विवरण। श्रीरामानुजाचार्य के प्रमुख शिष्यों और आलवारों की नामावली।

श्रीरामानुजाचार्य का यादवाद्रि में देवमूर्ति की स्थापना, दिल्ली से रामप्रिय मूर्ति लाना, सम्राट-कन्या की भक्ति और जातिविहीन भक्तिभाव का वर्णन।
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श्रीरामानुज स्वामी ने बौद्ध राजा विठ्ठलदेव सहित अनेक लोगों को वैष्णव धर्म अपनाने के बाद, शिष्यों के साथ यादवाद्रि (वर्तमान 'मेलमोटा') के लिए प्रस्थान किया। १०–२० शाके में, पूस शुक्ल चतुर्दशी, पुनर्वसु नक्षत्र, वृहस्पतिवार को, तुलसी वन में भ्रमण करते हुए उन्होंने मिट्टी के भीतर से एक देवमूर्ति प्राप्त की। भक्तों ने मूर्ति को पवित्र पीठ पर स्थापित किया और जल से स्नान कर पूजा-अर्चना की। वृद्ध स्थानीय लोगों ने बताया कि यह वही यादवाद्रिपति हैं जिनकी पूजा मुसलमान आक्रमण के कारण विघटित हो गई थी।
श्रीरामानुज स्वामी की आज्ञा से ग्रामीणों ने तुरंत एक विशाल पर्ण-शाला का निर्माण किया और उसमें यादवाद्रिपति की मूर्ति स्थापित कर सेवा प्रारम्भ की। जल-स्नान हेतु मन्दिर के समीप कल्याणी पुष्करिणी का उपयोग किया गया। यहीं से वैष्णवगण श्वेत मृत्तिका लेकर ऊर्ध्वपुण्ड्र करते थे। श्रीरामानुज स्वयं इसे ढूँढने गए और प्राप्त करने पर अत्यंत प्रसन्न हुए।
यादवाद्रिपति ने स्वप्न में श्रीरामानुज स्वामी को आदेश दिया कि उत्सव-मूर्ति 'रामप्रिय' को दिल्ली से लाकर स्थापित किया जाए। अगले दिन, शिष्यों सहित यतिराज दिल्ली प्रस्थान किए। सम्राट् ने उनके पाण्डित्य और प्रभाव देखकर उन्हें सम्मानित किया और मूर्ति ले जाने की अनुमति दी। श्रीरामानुज ने सम्राट की कन्या द्वारा प्रिय मूर्ति को पहचाना और उसे सुरक्षित लेकर अपने देश लौटे। मार्ग में तीन चांडालों की सहायता से सुरक्षित रूप से मूर्ति मन्दिर तक पहुँची। आज भी इन चांडालों को वर्ष में तीन दिन मन्दिर में जाने का अधिकार है।
राजकन्या ने मूर्ति के पीछे चलते हुए दिन-रात चलना शुरू किया। प्रकृत भक्त की भक्ति देखकर श्रीरामानुज स्वामी ने उसे जाति या कुल से परे माना और उसकी पूजा की अनुमति दी। सम्राट-कन्या का जीवन अपने प्रियतम रामप्रिय के संग बिताया, और उसका हृदय केवल भगवान के प्रति समर्पित रहा। उसका संसार-वन समाप्त हुआ और जीवन का शेष भाग भगवान के प्रिय-संगम में आनंदित होकर बीता।
श्रीहरि के निराकार और अखण्ड रूप के समान, इस साकार मूर्ति में अवतार रूप से भक्तों की रक्षा और कल्याण होता है। यादवाद्रिपति भी अर्चावतार हैं, और उनके उत्सव-विग्रह सम्पत्कुमार के माध्यम से लाए गए। सम्राट्-कन्या और राजकुमार ने देहात्म-ज्ञान प्राप्त कर जातिविहीन भक्ति का अनुभव किया। श्रीरामानुज स्वामी ने भी उनका आदर किया और आज भी सम्राट्-कन्या की पवित्र मूर्ति दक्षिण के विष्णु मन्दिर में पूजित है।
I am a writer and researcher dedicated to collecting and sharing Hindu stotra, rituals, festivals, and cultural wisdom. My work focuses on preserving and presenting authentic knowledge in a simple, meaningful way.
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