तेरहवाँ अध्याय गरुडपुराण (सारोद्धार) – सपिण्डन विधि, सूतक निर्णय एवं शय्यादान
अशौचकालका निर्णय, अशौचमें निषिद्ध कर्म, सपिण्डीकरणश्राद्ध, पिण्डमेलनकी प्रक्रिया, शय्यादान, पददान तथा गयाश्राद्धकी महिमा
जीवकी गर्भावस्थाका दुःख, गर्भमें पूर्वजन्मोंके ज्ञानकी स्मृति, जीवद्वारा भगवान्से अब आगे दुष्कर्मोंको न करनेकी प्रतिज्ञा, गर्भवाससे बाहर आते ही वैष्णवी मायाद्वारा उसका मोहित होना तथा गर्भावस्थाकी प्रतिज्ञाको भुला देना
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गरुडजीने कहा-हे केशव! नरकसे आया हुआ जीव माताके गर्भ में कैसे उत्पन्न होता है?... ॥१॥
भगवान् विष्णुने कहा-स्त्री और पुरुषके संयोगसे वीर्य और रजके स्थिर हो जानेपर... ॥२॥
ऋतुकालमें आरम्भके तीन दिनोंतक... पापात्माओंके देहकी उत्पत्ति होती है॥३॥
रजस्वला स्त्री प्रथम दिन चाण्डाली... नरकसे आये हुए प्राणियोंकी ये ही तीन माताएँ होती हैं ॥ ४॥
दैवकी प्रेरणासे कर्मानुरोधी शरीर प्राप्त करनेके लिये... स्त्रीके उदरमें प्रविष्ट होता है॥५॥
एक रात्रिमें वह शुक्राणु कलल... अण्डाकार हो जाता है॥६॥
स्त्रियोंने यह वर पाकर कि वे सर्वदा पुरुषका सहवास कर सकें... लिंगबोधक छिद्र उत्पन्न होते हैं ॥७॥
चौथे मासमें रस, रक्त, मांस... दाहिनी कोखमें घूमता है॥ ८॥
...वह जन्तु विष्ठा-मूत्रके दुर्गन्धयुक्त गड्ढेरूप गर्भाशयमें सोता है॥९॥
वहाँ गर्भस्थ क्षुधित कृमियोंके द्वारा... जिससे अत्यधिक क्लेश होता है॥१०॥
माताके द्वारा खाये हुए कडुवे... आँतोंद्वारा बाहरसे ढका रहता है॥११॥
उसकी पीठ और गरदन कुण्डलाकार... पड़ा रहता है ॥१२॥
भगवान्की कृपासे अपने सैकड़ों जन्मोंके कर्मोंका स्मरण करता हुआ... ॥१३॥
सात धातुओंके आवरणमें आवृत... भगवान्की स्तुति करता है॥१४॥
सातवें महीनेके आरम्भसे ही... ठहर नहीं पाता ॥१५॥
जीव कहता है—मैं लक्ष्मीके पति... भगवान् विष्णुकी शरणमें जाता हूँ॥१६–१७॥
मैंने अपने परिजनोंके उद्देश्यसे... फल भोगनेवाले पुत्र अलग हो गये॥१८॥
यदि इस गर्भसे निकलकर मैं बाहर आऊँ... मुक्ति प्राप्त कर लूँ॥१९॥
विष्ठा और मूत्रके कुँएमें गिरा हुआ... कब बाहर निकल पाऊँगा॥२०॥
जिस दीनदयालु परमात्माने मुझे विशेष ज्ञान दिया... संसारके चक्करमें न आना पड़े॥२१॥
मैं माताके गर्भगृहसे कभी भी बाहर जानेकी इच्छा नहीं करता... संसारसे अपना उद्धार कर लूँगा॥२२–२३॥
श्रीभगवान् बोले—इस प्रकार स्तुति करते हुए... नीचेकी ओर ढकेलता है॥२४॥
प्रसूतिमार्गसे गिराया गया वह जीव... अत्यधिक रुदन करने लगता है॥२५–२६॥
गर्भमें, रुग्णावस्थामें... कौन मुक्त न हो जाये?॥२७॥
कर्मभोगके अनन्तर... वैष्णवी माया मोहित कर देती है॥२८॥
मायाके स्पर्शसे जीव विवश होकर... दुःखोंको भोगता है॥२९–३०॥
विष्ठा-मूत्रसे अपवित्र शय्यापर... चेष्टा करनेमें असमर्थ रहता है॥३१॥
जैसे कृमि दूसरे कृमिको काटता है... व्यथित करते हैं॥३२॥
शैशवावस्थाका दुःख भोगकर... आसुरी सम्पत्ति प्राप्त करता है॥३३॥
दुर्व्यसनोंमें आसक्त होकर... शास्त्रसे द्वेष करता है॥३४॥
भगवान्की मायारूपी स्त्रीको देखकर... अग्निमें पतिंगा॥३५॥
हिरन, हाथी, पतिंगा... पाँचों विषयोंसे मोहित मनुष्य क्यों नहीं मरेगा?॥३६॥
अज्ञानके कारण क्रोध... दूसरे कामीजनोंसे मारा जाता है॥३७–३८॥
जो मूर्ख दुर्लभ मानवजीवनको... उससे बड़ा पापी कौन?॥३९॥
सैकड़ों योनियोंको पार करके... प्रमादसे नष्ट कर देता है॥४०॥
इसके बाद वृद्धावस्था... दुःखपूर्ण नरकमें जाता है॥४१॥
कर्मपाशोंसे बँधे हुए पापी... वैराग्य प्राप्त नहीं करते॥४२॥
हे तार्थ्य! इस प्रकार मैंने... अब और क्या सुनना चाहते हो?॥४३॥
॥ इस प्रकार गरुडपुराणके अन्तर्गत सारोद्धारमें ‘पापजन्मादिदुःखनिरूपण' नामक छठा अध्याय पूरा हुआ॥६॥
I am a writer and researcher dedicated to collecting and sharing Hindu stotra, rituals, festivals, and cultural wisdom. My work focuses on preserving and presenting authentic knowledge in a simple, meaningful way.
अशौचकालका निर्णय, अशौचमें निषिद्ध कर्म, सपिण्डीकरणश्राद्ध, पिण्डमेलनकी प्रक्रिया, शय्यादान, पददान तथा गयाश्राद्धकी महिमा
यमलोक एवं यम-सभाका वर्णन, चित्रगुप्त आदिके भवनोंका परिचय,धर्मराजनगरके चार द्वार, पुण्यात्माओंका धर्मसभामें प्रवेश
धर्मात्मा-जनका दिव्यलोकोंका सुख भोगकर उत्तम कुलमें जन्म लेना, शरीरके व्यावहारिक तथा पारमार्थिक दो रूपोंका वर्णन, अजपाजपकी विधि, भगवत्प्राप्तिके साधनोंमें भक्तियोगकी प्रधानता
