• 02 Apr, 2026

दशम अध्याय – श्रीरामानुज का संन्यास | रामानुजाचार्य जीवनचरित

दशम अध्याय – श्रीरामानुज का संन्यास | रामानुजाचार्य जीवनचरित

दशम अध्याय – संन्यास

इस अध्याय में श्रीरामानुजाचार्य के जीवन का वह निर्णायक क्षण वर्णित है, जब उन्होंने गृहस्थ जीवन का त्याग कर वैराग्य, धर्म और ज्ञान के पथ को चुना। यह प्रसंग न केवल उनका आध्यात्मिक उत्थान दर्शाता है, बल्कि वैष्णव गुरु-शिष्य परंपरा, भक्ति की मर्यादा और धर्म-शुद्धि का अनूठा उदाहरण भी है।


१. छह महीने का अध्ययन और गुरु-भक्ति

संन्यास से लगभग छह महीने पहले श्रीरामानुज, गुरु श्रीमहापूर्ण के पास द्राविड़ वेद के अमूल्य ग्रंथों और आलवारों की पवित्र दिव्य प्रबंध मलाओं का अध्ययन कर रहे थे।

उन्होंने अल्प समय में लगभग चार हज़ार दिव्य श्लोकों का अध्ययन पूरा कर लिया—जिनमें शामिल थे:

  • सतकोप (नम्मालवार) के 1296 प्रबंध
  • गोधा (आण्डाल) के 143 प्रबंध
  • विष्णुचित्त (पेरियालवार) के 476 प्रबंध
  • कुलशेखर आलवार के 145
  • भक्तिसार के 216
  • मधुरकवि के 11
  • परकाल मुनि के 1360

इस अद्भुत अध्ययन के बाद श्रीरामानुज गुरु के प्रति और भी समर्पित हो गए। उनके लिए गुरु की सेवा ही सर्वोच्च धर्म बन गया।


२. कुएँ पर संघर्ष – संन्यास की पहली चिंगारी

एक दिन श्रीमहापूर्ण की पत्नी और श्रीरामानुज की पत्नी तंजमाम्बा दोनों कुएँ पर जल लेने गईं। घड़े उठाते समय भूलवश गुरु-पत्नी की घड़े का जल तंजमाम्बा के घड़े पर गिर गया।

तंजमाम्बा के भीतर छिपी हुई जाति-अहंभावना जाग उठी। उसने बड़े कठोर शब्द कहे:

"तुम्हारे कुल का जल मेरे काम का नहीं। गुरु की पत्नी हो, इसलिए क्या तुम हम पर चढ़ोगी?"

महापूर्ण की पत्नी सरल, शीलवान और विनम्र थीं। उन्होंने शांत भाव से क्षमा माँग ली, परंतु मन में अत्यंत पीड़ा हुई। घटना बताने पर श्रीमहापूर्ण बोले:

"यह जगन्नाथ की इच्छा है। अब हमें यहाँ नहीं रहना चाहिए। चलो, श्रीरंगम् चलते हैं।"

यहीं से संन्यास का बीज अंकुरित हुआ।


३. रामानुज का गुरु-गृह पहुँचना और शोक

जब श्रीरामानुज गुरु-दंपति के लिए फल, वस्त्र आदि लेकर उनके घर पहुँचे तो वहाँ कोई नहीं था। पड़ोसियों से पता चला कि वे दोनों श्रीरंगम् चले गए।

क्रोधित होकर वे घर पहुँचे और तंजमाम्बा से पूछा। उसने घटना बताते हुए गुरु की कटु आलोचना कर दी।

श्रीरामानुज आहत हुए और बोले:

"पापिन! तेरा मुख देखना भी पाप है।"

और उसी क्षण उनके मन में गृहत्याग का पहला संकल्प जाग उठा।


४. अतिथि अपमान – गृहस्थ जीवन छोड़ने का निर्णायक कारण

इसके तुरंत बाद एक भूखा ब्राह्मण घर पहुँचा। तंजमाम्बा ने क्रोध में उसे भोजन देने से मना कर दिया।

वह भूखा ब्राह्मण श्रीरामानुज को मार्ग में मिला। उसकी दशा देखकर रामानुज का मन द्रवित हुआ। उन्होंने उसे पत्र, वस्त्र और पुष्प देकर तंजमाम्बा के पास भेजा।

तंजमाम्बा ने पत्र पढ़ा और पिता के आदेश समझकर तुरंत मायके जाने को तैयार हो गई।

इस प्रकार एक ही दिन में दो घटनाएँ—गुरुपत्नी से अपमान और अतिथि-अपमान—ने रामानुज के भीतर गृहस्थ धर्म के प्रति मोह को समाप्त कर दिया।


५. श्रीरामानुज का अंतिम निर्णय – संन्यास का उदय

तंजमाम्बा के जाते ही श्रीरामानुज के भीतर एक तीव्र आध्यात्मिक आकांक्षा जागी।

रास्ते में जाते-जाते वे अपने आप से कहने लगे:

“पापनांकाराः स्त्रियः… हे नारायण! आज से मैं केवल आपका हूँ।”

वह सीधा काञ्चीपुर स्थित श्रीवरदराज मंदिर पहुँचे और भगवान के समक्ष अपना शरीर, मन और वचन अर्पित कर दिया।


६. त्रिदण्ड ग्रहण – ‘यतिराज’ की उपाधि

श्रीवरदराज के चरणों में प्रणाम करके उन्होंने काषाय वस्त्र धारण किया। तभी श्रीकाञ्चीपूर्ण ने उन्हें संबोधित किया:

“तुम अब यति-राज हो — संन्यासियों के राजा।”

अनन्त सरोवर के तट पर उन्होंने वैष्णव-संन्यास की रीति से त्रिदण्ड ग्रहण किया और संसार-बंधन से मुक्त हो गए।

उस क्षण उनकी तेजस्विता ऐसे थी जैसे नवोदित सूर्य अपनी पहली किरणों के साथ जगत को आलोकित कर रहा हो।


७. अध्याय का सार

  • तंजमाम्बा और गुरु-पत्नी का झगड़ा वैराग्य का पहला कारण बना।
  • अतिथि-अपमान ने संन्यास को पक्का कर दिया।
  • श्रीरामानुज ने चार हजार दिव्य प्रबंधों का अध्ययन पूरा किया।
  • गुरु-भक्ति और धर्म के प्रति समर्पण ने उन्हें गृहत्याग के लिए प्रेरित किया।
  • श्रीवरदराज मंदिर में उन्होंने संन्यास और त्रिदण्ड ग्रहण किया।
  • श्रीकाञ्चीपूर्ण द्वारा उन्हें “यति-राज” कहा गया।

Hari Krishna Regmi

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I am a writer and researcher dedicated to collecting and sharing Hindu stotra, rituals, festivals, and cultural wisdom. My work focuses on preserving and presenting authentic knowledge in a simple, meaningful way.