त्रयोविंश अध्याय – धनुर्दास | श्रीरामानुजाचार्य जीवन कथा
धनुर्दास और उनकी पत्नी हेमाम्बा की भक्ति, श्रीरामानुजाचार्य की कृपा, गरुड़-महोत्सव में घटनाएँ, गुण और ब्राह्मण धर्म का महत्व।

इस अध्याय में श्रीरामानुजाचार्य के जीवन का वह निर्णायक क्षण वर्णित है, जब उन्होंने गृहस्थ जीवन का त्याग कर वैराग्य, धर्म और ज्ञान के पथ को चुना। यह प्रसंग न केवल उनका आध्यात्मिक उत्थान दर्शाता है, बल्कि वैष्णव गुरु-शिष्य परंपरा, भक्ति की मर्यादा और धर्म-शुद्धि का अनूठा उदाहरण भी है।
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संन्यास से लगभग छह महीने पहले श्रीरामानुज, गुरु श्रीमहापूर्ण के पास द्राविड़ वेद के अमूल्य ग्रंथों और आलवारों की पवित्र दिव्य प्रबंध मलाओं का अध्ययन कर रहे थे।
उन्होंने अल्प समय में लगभग चार हज़ार दिव्य श्लोकों का अध्ययन पूरा कर लिया—जिनमें शामिल थे:
इस अद्भुत अध्ययन के बाद श्रीरामानुज गुरु के प्रति और भी समर्पित हो गए। उनके लिए गुरु की सेवा ही सर्वोच्च धर्म बन गया।
एक दिन श्रीमहापूर्ण की पत्नी और श्रीरामानुज की पत्नी तंजमाम्बा दोनों कुएँ पर जल लेने गईं। घड़े उठाते समय भूलवश गुरु-पत्नी की घड़े का जल तंजमाम्बा के घड़े पर गिर गया।
तंजमाम्बा के भीतर छिपी हुई जाति-अहंभावना जाग उठी। उसने बड़े कठोर शब्द कहे:
"तुम्हारे कुल का जल मेरे काम का नहीं। गुरु की पत्नी हो, इसलिए क्या तुम हम पर चढ़ोगी?"
महापूर्ण की पत्नी सरल, शीलवान और विनम्र थीं। उन्होंने शांत भाव से क्षमा माँग ली, परंतु मन में अत्यंत पीड़ा हुई। घटना बताने पर श्रीमहापूर्ण बोले:
"यह जगन्नाथ की इच्छा है। अब हमें यहाँ नहीं रहना चाहिए। चलो, श्रीरंगम् चलते हैं।"
यहीं से संन्यास का बीज अंकुरित हुआ।
जब श्रीरामानुज गुरु-दंपति के लिए फल, वस्त्र आदि लेकर उनके घर पहुँचे तो वहाँ कोई नहीं था। पड़ोसियों से पता चला कि वे दोनों श्रीरंगम् चले गए।
क्रोधित होकर वे घर पहुँचे और तंजमाम्बा से पूछा। उसने घटना बताते हुए गुरु की कटु आलोचना कर दी।
श्रीरामानुज आहत हुए और बोले:
"पापिन! तेरा मुख देखना भी पाप है।"
और उसी क्षण उनके मन में गृहत्याग का पहला संकल्प जाग उठा।
इसके तुरंत बाद एक भूखा ब्राह्मण घर पहुँचा। तंजमाम्बा ने क्रोध में उसे भोजन देने से मना कर दिया।
वह भूखा ब्राह्मण श्रीरामानुज को मार्ग में मिला। उसकी दशा देखकर रामानुज का मन द्रवित हुआ। उन्होंने उसे पत्र, वस्त्र और पुष्प देकर तंजमाम्बा के पास भेजा।
तंजमाम्बा ने पत्र पढ़ा और पिता के आदेश समझकर तुरंत मायके जाने को तैयार हो गई।
इस प्रकार एक ही दिन में दो घटनाएँ—गुरुपत्नी से अपमान और अतिथि-अपमान—ने रामानुज के भीतर गृहस्थ धर्म के प्रति मोह को समाप्त कर दिया।
तंजमाम्बा के जाते ही श्रीरामानुज के भीतर एक तीव्र आध्यात्मिक आकांक्षा जागी।
रास्ते में जाते-जाते वे अपने आप से कहने लगे:
“पापनांकाराः स्त्रियः… हे नारायण! आज से मैं केवल आपका हूँ।”
वह सीधा काञ्चीपुर स्थित श्रीवरदराज मंदिर पहुँचे और भगवान के समक्ष अपना शरीर, मन और वचन अर्पित कर दिया।
श्रीवरदराज के चरणों में प्रणाम करके उन्होंने काषाय वस्त्र धारण किया। तभी श्रीकाञ्चीपूर्ण ने उन्हें संबोधित किया:
“तुम अब यति-राज हो — संन्यासियों के राजा।”
अनन्त सरोवर के तट पर उन्होंने वैष्णव-संन्यास की रीति से त्रिदण्ड ग्रहण किया और संसार-बंधन से मुक्त हो गए।
उस क्षण उनकी तेजस्विता ऐसे थी जैसे नवोदित सूर्य अपनी पहली किरणों के साथ जगत को आलोकित कर रहा हो।
I am a writer and researcher dedicated to collecting and sharing Hindu stotra, rituals, festivals, and cultural wisdom. My work focuses on preserving and presenting authentic knowledge in a simple, meaningful way.
धनुर्दास और उनकी पत्नी हेमाम्बा की भक्ति, श्रीरामानुजाचार्य की कृपा, गरुड़-महोत्सव में घटनाएँ, गुण और ब्राह्मण धर्म का महत्व।
विशिष्टाद्वैत वेदांत के अनुसार जीव, प्रकृति और परब्रह्म के स्वरूप, कारण और परिणाम, जीवों का तिरोहित स्वरूप, तथा मोक्ष और भक्ति का मार्ग।
श्रीरामानुजाचार्य द्वारा रचित प्रमुख ग्रन्थों का परिचय एवं विवरण। वेदार्थ संग्रह, वेदान्तसार, वेदान्त दीप, श्रीभाष्य, गीता भाष्य, गद्यत्रय, नित्याराधन।
