त्रयोविंश अध्याय – धनुर्दास | श्रीरामानुजाचार्य जीवन कथा
धनुर्दास और उनकी पत्नी हेमाम्बा की भक्ति, श्रीरामानुजाचार्य की कृपा, गरुड़-महोत्सव में घटनाएँ, गुण और ब्राह्मण धर्म का महत्व।

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श्रीयामुनाचार्य के लीला संवरण करने पर श्रीरंगमठ का यथार्थ में कोई नेता नहीं था। यद्यपि श्रीमहापूर्ण और श्रीवरंग उस अलौकिक महापुरुष के योग्य शिष्य थे, फिर भी सभी शिष्य उस सर्वशास्त्रमर्मज्ञ, ईश्वरानुरागमय, सौम्यदर्शन महात्मा के अभाव को अनुभव कर रहे थे।
शिष्यों के भीतर फिर भी एक आशा थी—वे बार-बार गुरुमुख से श्रीरामानुज की महिमा सुन चुके थे। श्रीयामुनाचार्य कहा करते थे कि “श्रीरामानुज अवतारी पुरुष हैं।” उन्हें ही लाने के लिए श्रीमहापूर्ण भेजे गए थे।
श्रीमहापूर्ण लंबे समय तक श्रीरामानुज के घर रहे और उन्हें प्रबन्धमाला में अत्यंत निष्णात किया। उसी बीच उन्हें समाचार मिला कि श्रीरामानुज ने संन्यास ग्रहण कर लिया है। यह सुनते ही वे अत्यंत प्रसन्न हुए और श्रीरंगनाथ के समीप जाकर प्रार्थना की— “हे शरणागतपालक, हमारे इस अभाव को पूर्ण करने हेतु श्रीरामानुज को अपने चरणों में बुलाइए।”
भगवान ने आदेश दिया कि वरंग को कांची भेजा जाए। वे संगीत द्वारा श्रीवरदराज को प्रसन्न करेंगे और उनसे भिक्षा रूप में श्रीरामानुज को माँगेंगे—क्योंकि बिना भगवान की आज्ञा के यतिराज स्थान नहीं छोड़ सकते।
वरंग ने श्रीवरदराज को गीतों से प्रसन्न कर श्रीरामानुज को वर में माँग लिया। भगवान ने भक्त-वियोग को सहकर उनकी प्रार्थना स्वीकार की। वरंग श्रीरामानुज को लेकर जब श्रीरंग पहुँचे तो मठवासी, वैष्णव और नगरवासी अपार आनंद में भर गए।
श्रीरंगनाथ ने श्रीरामानुज को उभयविभूतिपति का पद प्रदान किया— अर्थात त्रिपाद्विभूति और लीलाविभूति का स्वामित्व। इससे यतिराज का तेज और अधिक प्रकाशित हुआ और देश-देशांतर से वैष्णव उनके दर्शन हेतु आने लगे।
इस समय श्रीरामानुज का मन अपने परम प्रिय भाई गोविन्द के लिए अत्यंत चंचल हो उठा। जिसने यादव के षड्यंत्र का भेद बताया था, जिसकी सरलता और पांडित्य सबको चकित करता था— उसी को वे अपने दिव्य सुख में सहभागी बनाना चाहते थे।
उन्हें स्मरण हुआ कि चरम वैष्णव श्रीशैलपूर्ण कालहस्ति के समीप रहते हैं और उन्हीं के द्वारा गोविन्द को वैष्णव मार्ग में लाया जा सकता है। अतः उन्होंने उन्हें पत्र भेजा।
श्रीशैलपूर्ण अपने शिष्यों सहित कालहस्ति पहुँचे और सरोवर के तट पर रहने लगे। गोविन्द प्रतिदिन फूल लेने और स्नान हेतु वहाँ आते थे। एक दिन उन्होंने देखा कि श्वेतवस्त्रधारी दिव्य वैष्णव वहाँ शास्त्रालाप कर रहे हैं।
श्रीशैलपूर्ण ने गोविन्द के मार्ग में तालपत्र पर “स्वाभाविकानवधिकातिशयेशितृत्वम्” वाला श्लोक रखवा दिया। गोविन्द ने पढ़ा, विचार किया और आगे बढ़ गए—पर लौटकर फिर उसे उठाया और गहराई से अर्थ पर चिंतन किया। इससे उनके हृदय में वैष्णव मार्ग के प्रति आकर्षण जागृत हुआ।
तीसरी बार श्रीशैलपूर्ण आये तो वे सहस्र-गीति की व्याख्या कर रहे थे। गोविन्द पेड़ पर पुष्प तोड़ रहे थे, परंतु व्याख्या सुनते-सुनते सब भूल गए।
जब उन्होंने यह वाक्य सुना— “अस्मत्स्वामीनो न्यस्य कस्य पुष्पं चन्दनं च योग्यं भवेत्” —तो वे तुरंत नीचे उतरे, पुष्प-टोकरी और रुद्राक्षमाला फेंक दी और श्रीशैलपूर्ण के चरणों में गिर पड़े।
बार-बार कहते—“न योग्यं, न योग्यं…” और विषण्णचित्त होकर प्रलाप करने लगे। श्रीशैलपूर्ण ने उन्हें हृदय से लगाया और स्नेहपूर्वक सान्त्वना दी।
वे गोविन्द को लेकर तिरुपति लौटे और वहाँ उन्हें वैष्णव दीक्षा देकर श्रीवैष्णव परंपरा में स्थापित किया। इस प्रकार श्रीरामानुज के परम आत्मीय भाई गोविन्द का श्रीवैष्णव धर्म में प्रवेश पूर्ण हुआ।
I am a writer and researcher dedicated to collecting and sharing Hindu stotra, rituals, festivals, and cultural wisdom. My work focuses on preserving and presenting authentic knowledge in a simple, meaningful way.
धनुर्दास और उनकी पत्नी हेमाम्बा की भक्ति, श्रीरामानुजाचार्य की कृपा, गरुड़-महोत्सव में घटनाएँ, गुण और ब्राह्मण धर्म का महत्व।
विशिष्टाद्वैत वेदांत के अनुसार जीव, प्रकृति और परब्रह्म के स्वरूप, कारण और परिणाम, जीवों का तिरोहित स्वरूप, तथा मोक्ष और भक्ति का मार्ग।
श्रीरामानुजाचार्य द्वारा रचित प्रमुख ग्रन्थों का परिचय एवं विवरण। वेदार्थ संग्रह, वेदान्तसार, वेदान्त दीप, श्रीभाष्य, गीता भाष्य, गद्यत्रय, नित्याराधन।
