त्रयोविंश अध्याय – धनुर्दास | श्रीरामानुजाचार्य जीवन कथा
धनुर्दास और उनकी पत्नी हेमाम्बा की भक्ति, श्रीरामानुजाचार्य की कृपा, गरुड़-महोत्सव में घटनाएँ, गुण और ब्राह्मण धर्म का महत्व।

श्रीरामानुजाचार्य अपने शिष्यों को नम्माल्वार अथवा शठारि-विरचित ‘सहस्त्रगीति’ नामक द्राविड़ प्रबन्धमाला का पाठ कराने लगे। आपने यह ग्रन्थ श्रीमहापूर्ण एवं श्रीमालाघर से अध्ययन किया था, परन्तु अपनी दिव्य बुद्धि के कारण अनेक नवीन रहस्यों की व्याख्या कर शिष्यों को चकित करते रहे।
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सहस्त्रगीति में श्रीशैल (वेकटाचल/तिरुमला) का माहात्म्य वर्णित है — यह पृथ्वी का वैकुण्ठ है। जो यहाँ आजीवन वास करते हैं, वे वास्तव में वैकुण्ठवासी होते हैं तथा अन्त में भगवान श्रीनारायण के चरणों में स्थान पाते हैं।
पाठ समाप्त होने पर स्वामीजी ने पूछा — “तुममें से कौन आजीवन श्रीशैल पर वास करना चाहेगा?” इस पर शिष्य श्रीअनन्ताचार्य ने तत्परता से कहा — “प्रभो! यदि आज्ञा दें तो मैं वहाँ निवास करूँ।”
श्रीरामानुज अत्यन्त प्रसन्न हुए— “वत्स! तुम धन्य हो। तुमने अपनी चौदह पीढ़ियों का उद्धार कर दिया।” इस प्रकार आशीर्वाद लेकर श्रीअनन्ताचार्य श्रीशैल के लिए प्रस्थान कर गये।
तदनंतर यतिराज ने शिष्यों सहित श्रीशैल की यात्रा प्रारम्भ की। मार्ग में भगवान् के नाम-कीर्तन उनकी एकमात्र पूँजी थी। पहले दिन वे देहली पहुँचे; दूसरे दिन अष्टसहस्त्र ग्राम की ओर बढ़े जहाँ दो ब्राह्मण शिष्य निवास करते थे — यज्ञेश और श्रीवरदाचार्य।
यज्ञेश धनी था। स्वामीजी ने पहले उसके यहाँ ठहरने का संदेश भेजा। परन्तु यज्ञेश आतिथ्य की तैयारी में लग गया और आने वाले शिष्यों को पूछना भूल गया। शिष्यों ने इसे अनादर समझकर रामानुजाचार्य को सूचित किया।
इससे अत्यन्त दुःखी होकर स्वामीजी ने निश्चय किया कि वे दूसरे शिष्य कार्पासारामवरद (दरिद्र ब्राह्मण) के यहाँ ठहरेंगे — जो प्रतिदिन भिक्षा लेकर भगवान नारायण की सेवा करता था।
जब स्वामीजी उसके घर पहुँचे, तब वरदाचार्य बाहर भिक्षा हेतु गये थे। भीतर उनकी पत्नी लक्ष्मी देवी अकेली थीं और वस्त्र सूखने के कारण बाहर नहीं आ सकीं। उन्होंने केवल करतलध्वनि करके अपनी अवस्था बतलाई।
स्वामीजी ने अपना दुपट्टा भीतर फेंका। उसे ओढ़कर वह बाहर आई, प्रणाम किया और कहा — “गुरुदेव! कृपा करके विश्राम लें। मैं शीघ्र नैवेद्य तैयार करती हूँ।”
परन्तु घर में अन्न का एक दाना भी न था। विचार करते-करते उसे पास के घनक बनिये की बात याद आई — जो उसके रूप पर आसक्त था और बार-बार उसे धर्मविरुद्ध मार्ग पर ले जाना चाहता था।
लक्ष्मी देवी ने निश्चय किया — “इस नश्वर देह को त्यागकर भी यदि गुरु-सेवा सफल हो, तो यह श्रेष्ठ है।”
वे दूसरे द्वार से बनिये के घर गईं और कहा — “आज आपकी इच्छा पूर्ण कर दूँगी। पर पहले मेरे गुरु आये हैं, उनकी सेवा हेतु आवश्यक सामग्री दीजिए।”
बनिया विस्मित और प्रसन्न हो तुरंत सब सामग्री दे बैठा। लक्ष्मी देवी ने भगवान् हेतु नैवेद्य तैयार किया और गुरु तथा शिष्यों को प्रेमपूर्वक भोजन कराया।
वरदाचार्य लौटे और जब सुना कि उनकी पत्नी ने दिव्य भोजन कराया, तो वे अत्यन्त प्रसन्न हुए — “तुमने आज सतीत्व का सार दिखा दिया। गुरुरूपी नारायण ही परम पुरुष हैं।”
वे पत्नी को साथ लेकर स्वामीजी के समीप पहुँचे और प्रणाम किया। संपूर्ण घटना सुनकर रामानुजाचार्य भी आश्चर्यचकित व प्रसन्न हुए।
दम्पत्ति ने बचा हुआ प्रसाद बनिये को अर्पित किया। प्रसाद ग्रहण करते ही उसकी दुष्ट वृत्ति क्षीण हो गई। उसने लक्ष्मी देवी को ‘माता’ कहकर अपराध स्वीकार किया —
“मैं महापाप करने वाला था; आज प्रसाद एवं तुम्हारी कृपा से बच गया। मुझे भी भगवान् के दर्शन कराओ।”
लक्ष्मी देवी अत्यन्त प्रसन्न हुईं और उसे रामानुज के पास ले आईं। स्वामीजी ने उसे शिष्य बनाकर कृतार्थ किया।
स्वामीजी ने बनिये से प्राप्त धन वरदाचार्य को देना चाहा। पर उन्होंने कहा —
“प्रभो! धन से मोह बढ़ता है और भगवान् से चित्त दूर हो जाता है। हमें भिक्षा ही पर्याप्त है — कृपा करके हमें धन-ग्रहण की आज्ञा न दें।”
यतिराज अत्यन्त प्रसन्न हुए और कहा — “आज निस्पृह एवं पवित्र ब्राह्मण को देखकर मेरा मन आनन्द से भर गया।”
इतने में यज्ञेश वहाँ आया। उसे ज्ञात हुआ कि स्वामीजी ने उसके यहाँ आतिथ्य स्वीकार नहीं किया। उसने दुखित होकर कहा —
“प्रभो! धनान्धता नहीं, आपके आगमन का अत्यानन्द ही कारण था। अपराध हो गया — दया करके क्षमा दें।”
स्वामीजी ने समझाया —
“वैष्णव असम्मान से बड़ा दोष नहीं। तुमने मेरे थके शिष्यों का सत्कार नहीं किया — इस कारण मैं कार्पासाराम गया।”
यज्ञेश ने पश्चाताप किया, और स्वामीजी ने लौटते समय उसका सत्कार स्वीकार करने की प्रतिज्ञा करके उसे संतोष दिया।
I am a writer and researcher dedicated to collecting and sharing Hindu stotra, rituals, festivals, and cultural wisdom. My work focuses on preserving and presenting authentic knowledge in a simple, meaningful way.
धनुर्दास और उनकी पत्नी हेमाम्बा की भक्ति, श्रीरामानुजाचार्य की कृपा, गरुड़-महोत्सव में घटनाएँ, गुण और ब्राह्मण धर्म का महत्व।
विशिष्टाद्वैत वेदांत के अनुसार जीव, प्रकृति और परब्रह्म के स्वरूप, कारण और परिणाम, जीवों का तिरोहित स्वरूप, तथा मोक्ष और भक्ति का मार्ग।
श्रीरामानुजाचार्य द्वारा रचित प्रमुख ग्रन्थों का परिचय एवं विवरण। वेदार्थ संग्रह, वेदान्तसार, वेदान्त दीप, श्रीभाष्य, गीता भाष्य, गद्यत्रय, नित्याराधन।
