त्रयोविंश अध्याय – धनुर्दास | श्रीरामानुजाचार्य जीवन कथा
धनुर्दास और उनकी पत्नी हेमाम्बा की भक्ति, श्रीरामानुजाचार्य की कृपा, गरुड़-महोत्सव में घटनाएँ, गुण और ब्राह्मण धर्म का महत्व।

Table of contents [Show]
दूसरे दिन प्रातःकाल अष्टसहस्त्र गाँव को छोड़कर श्रीरामानुज शिष्यों के साथ काञ्चीपुर की ओर चले। मध्याह्न के समय वे वहाँ पहुँचे और श्रीवरदराज के दर्शन कर स्वयं को धन्य समझा। अगले दिन महात्मा श्रीकाञ्चीपूर्ण से उनके दर्शन हुए, जिससे उनका हृदय अति प्रसन्न हुआ। वहाँ तीन दिन निवास करके वे कपिल तीर्थ की ओर बढ़े। वहाँ स्नानादि करके वे उसी दिन श्रीशैल पर्वत के समीप उपस्थित हुए।
श्रीशैल के दर्शन से उनका हृदय परम आनन्द से भर उठा। वे देर तक उस दिव्य भूवैकुण्ठ की ओर निहारते रहे। उनके नेत्रों से आनंदाश्रु बहने लगे। उन्होंने सोचा—यह वही पावन क्षेत्र है जहाँ स्वयम् श्रीनारायण और लक्ष्मीजी निवास करते हैं। पृथ्वी के समस्त पुण्य जैसे इस पर्वत-रूप में एकत्र हो गए हों। इस पुण्यभूमि को अपने अपवित्र शरीर से स्पर्श कर अपवित्र न कर दूँ—यह सोचकर उन्होंने पर्वत पर न चढ़ने का संकल्प किया। उन्होंने निश्चय किया कि यहीं रहकर प्रतिदिन दर्शन कर अपने शरीर और मन को पवित्र करूँगा।
वहीं के राजा विठ्ठलदेव को जब उनके आगमन का समाचार मिला, तो वे मंत्रीगण सहित उपस्थित हुए और शिष्य बनने की प्रार्थना की। दयालु यतिराज ने संस्कार द्वारा उन्हें शिष्यत्व प्रदान किया। गुरु-दक्षिणा में राजा ने “इलमण्डप” नामक प्रदेश भेंट किया, जिसे यतिराज ने गरीब ब्राह्मणों को दान कर दिया।
श्रीशैल के साधु-सन्त जब यह सुनकर आए कि यतिराज पर्वत पर न चढ़ने का संकल्प कर चुके हैं, तो वे निवेदन करने लगे—“महात्मन्! यदि आप जैसे आचार्य भी चरण-स्पर्श के भय से पर्वत पर नहीं चढ़ेंगे, तो सामान्य जन भी ऐसा ही करेंगे। तीर्थ आपके जैसे महात्माओं के कारण ही तीर्थ कहलाते हैं।”
उनके विनीत शब्दों को आज्ञा मानकर यतिराज पर्वतारोहण के लिए उद्यत हुए। चढ़ाई कठिन होने से उनका शरीर भूख-प्यास से थक गया। तभी श्रीशैलपूर्ण ऊपर से प्रसाद और श्रीपाद-तीर्थ लेकर आए। यतिराज ने विनम्रता से कहा—“महात्मन्! आपको क्यों कष्ट हुआ?” श्रीशैलपूर्ण ने हँसकर उत्तर दिया—“मैं किसी बालक को भेजने ही वाला था, पर मुझसे अधिक बालक कोई और मिलता ही नहीं।” यह सुनकर यतिराज चकित रह गए।
प्रसाद ग्रहण कर आगे बढ़ते हुए वे श्रीवेंकटनाथ के मंदिर पहुँचे। शिष्य अनन्ताचार्य ने उन्हें प्रणाम किया। मंदिर दर्शन के समय यतिराज के नेत्रों से आनंदधारा बह चली और वे समाधि-समान हो गए। प्रसाद-पादतीर्थ लेकर वे तीन दिन वहाँ रहे, फिर पर्वत से नीचे उतरे।
इसी समय श्रीशैलपूर्ण के परम अनुगत शिष्य और यतिराज के मौसेरे भाई गोविन्द उनसे मिलने आए। पहले ही बताया गया है कि गोविन्द ने श्रीशैलपूर्ण से वैष्णव-दीक्षा ली थी और बालवत् सरल स्वभाव से गुरुसेवा में तत्पर रहता था।
श्रीशैलपूर्ण के आग्रह पर यतिराज एक वर्ष वहीं रहे। प्रतिदिन वे उन्हें रामायण पढ़ाते और उसकी गम्भीर व्याख्या सुनाकर उनकी जिज्ञासा बढ़ाते। एक दिन यतिराज ने देखा कि गोविन्द गुरु की शय्या पर सो गया है। उन्होंने यह बात श्रीशैलपूर्ण को बताई। जब गुरु ने उससे पूछा—“गुरु की शय्या पर सोने से क्या होता है?” गोविन्द ने कहा—“नरकवास!” फिर भी उसने कहा—“यदि मेरी नरक-यात्रा से गुरु को सुख मिले, तो वह नरक भी मुझे स्वीकार है।” यह सुनकर दोनों आश्चर्यचकित और प्रसन्न हुए।
एक बार यतिराज ने देखा कि गोविन्द एक सांप के मुँह में अंगुली डालकर उसे खींच रहा है। उन्होंने डाँटा—“यह क्या पागलपन है!” पर गोविन्द ने बताया कि उसके गले में काँटा चुभा था, इसलिए वह पीड़ा दूर कर रहा था। यतिराज उसकी जीव-हितैषिता देखकर प्रसन्न हुए।
वर्ष पूरा होने पर यतिराज ने गोविन्द को गुरु-दक्षिणा में माँगा, और श्रीशैलपूर्ण ने उसे तुरंत सौंप दिया। बाद में गोविन्द को पुनः गुरु के पास भेजा गया, परंतु श्रीशैलपूर्ण ने कहा—“जो घोड़ा बिक चुका है, उसका पालन मैं क्यों करूँ?” भूखे-प्यासे लौटकर गोविन्द ने यतिराज के चरण पकड़ लिए—“अब मैं आपका हूँ।”
तबसे वह श्रीरामानुज की सेवा में पूर्ण रूप से दीक्षित हुआ।
काञ्चीपुर में तीन दिन रहने के बाद यतिराज अष्टसहस्र गाँव पहुँचे, जहाँ यज्ञेश ने सेवा की। एक रात्रि ठहरकर वे शिष्यों सहित श्रीरंगम लौट आए।
I am a writer and researcher dedicated to collecting and sharing Hindu stotra, rituals, festivals, and cultural wisdom. My work focuses on preserving and presenting authentic knowledge in a simple, meaningful way.
धनुर्दास और उनकी पत्नी हेमाम्बा की भक्ति, श्रीरामानुजाचार्य की कृपा, गरुड़-महोत्सव में घटनाएँ, गुण और ब्राह्मण धर्म का महत्व।
विशिष्टाद्वैत वेदांत के अनुसार जीव, प्रकृति और परब्रह्म के स्वरूप, कारण और परिणाम, जीवों का तिरोहित स्वरूप, तथा मोक्ष और भक्ति का मार्ग।
श्रीरामानुजाचार्य द्वारा रचित प्रमुख ग्रन्थों का परिचय एवं विवरण। वेदार्थ संग्रह, वेदान्तसार, वेदान्त दीप, श्रीभाष्य, गीता भाष्य, गद्यत्रय, नित्याराधन।
