त्रयोविंश अध्याय – धनुर्दास | श्रीरामानुजाचार्य जीवन कथा
धनुर्दास और उनकी पत्नी हेमाम्बा की भक्ति, श्रीरामानुजाचार्य की कृपा, गरुड़-महोत्सव में घटनाएँ, गुण और ब्राह्मण धर्म का महत्व।

श्रीरामानुजाचार्य द्वारा श्रीभाष्य की रचना, कश्मीर यात्रा, बोधायनवृत्ति की प्राप्ति, कूरेश की अद्भुत स्मृति, शारदा देवी का आशीर्वाद और वेदान्त सिद्धांत की स्थापना का विस्तृत वर्णन।
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एक दिन अपने शिष्यों के समक्ष यतिराज श्रीरामानुजाचार्य, श्रीयामुनाचार्य के गुणों का वर्णन कर रहे थे। उसी समय उन्हें अपनी वह प्रतिज्ञा स्मरण हुई जो कावेरी तट पर श्रीयामुनाचार्य के अंतिम दर्शन के समय की गई थी। उनकी तीन मुड़ी हुई अंगुलियाँ तीन प्रतिज्ञाओं का संकेत थीं—और उनमें से एक प्रतिज्ञा थी “श्रीभाष्य की रचना करने की।”
श्रीरामानुज ने कहा— “मैंने श्रीयामुन मुनि से प्रतिज्ञा की थी कि मैं श्रीभाष्य की रचना अवश्य करूँगा, परंतु अभी तक इस कार्य की शुरुआत नहीं हो सकी है। इस ग्रन्थ के लिए ‘बोधायन-वृत्ति’ की आवश्यकता है, परंतु यह ग्रन्थ इस देश में मिलना कठिन है। काश्मीर में इसकी सुरक्षित प्रति होने की बात सुनता हूँ। अतः मैं अभी कूरेश के साथ काश्मीर के लिए प्रस्थान करता हूँ। हे भक्तो! मेरे सफलतापूर्वक लौटने के लिए भगवान से प्रार्थना करो।”
तीन महीने की कठिन यात्रा के बाद दोनों शारदा पीठ पहुँचे। वहाँ के पण्डितों ने यतिराज की वाणी, विद्वत्ता और शास्त्र-प्रभुत्व देखकर अत्यन्त आश्चर्य किया और उनका सम्मानपूर्वक स्वागत किया।
जब श्रीरामानुज ने बोधायन-वृत्ति देखने की इच्छा प्रकट की, तब वहाँ के अद्वैतवादी पण्डितों ने सोचा— “यदि यह ग्रंथ इन्हें मिल गया, तो इनके सिद्धांत को और भी बल मिलेगा, और अद्वैत मत का प्रबल प्रतिपक्ष तैयार हो जाएगा।”
इसलिए उन्होंने झूठ कहा— “वह पुस्तक तो हमारे पास थी, पर दुर्भाग्यवश कीड़ों ने नष्ट कर दी है।”
यह सुनकर यतिराज अत्यंत दुखी हुए और उसी दुःख में सो गए।
उसी समय भगवती सरस्वती स्वयं बोधायन-वृत्ति लेकर उपस्थित हुईं और बोलीं— “वत्स! यह ग्रंथ ले लो और शीघ्र अपने देश चलो। काश्मीर के पण्डितों को यदि यह ज्ञात हो गया, तो यहाँ से निकलना कठिन हो जाएगा।” यह कहकर देवी अंतर्धान हो गईं।
काश्मीर के पण्डितों ने जब पुस्तकालय का निरीक्षण किया और बोधायन-वृत्ति न मिली, तो उन्होंने समझ लिया कि दक्षिण से आए दोनों पंडित पुस्तक ले गए हैं। वे तत्परता से उनके पीछे भागे और एक महीने के पश्चात् उन्हें मार्ग में पकड़ लिया। शूद्र-प्रकृति वाले उन बलवान् व्यक्तियों ने बलपूर्वक वह ग्रंथ छीन लिया और चले गए।
यतिराज को यह अत्यंत दुखद लगा; परंतु उनके लिए एक महान् आश्चर्य प्रतीक्षा कर रहा था।
कूरेश ने गुरु से कहा— “आश्रितवत्सल! आप शोक क्यों करते हैं? जब से हम कश्मीर से चले हैं, आप सो जाते थे, और मैं प्रतिदिन रात्रि में बोधायन-वृत्ति का पाठ करता था। अब वह मेरे हृदय में पूर्ण रूप से कण्ठस्थ हो चुकी है। मैं यहीं बैठकर इसे सम्पूर्ण लिख देता हूँ।”
यह सुनकर श्रीरामानुज ने कूरेश को आलिंगन किया और कहा— “वत्स! तुम चिरंजीवी हो। तुमने नष्ट रत्न का उद्धार कर दिया। आज से मैं सदैव तुम्हारा ऋणी रहा।”
श्रीरंगम् पहुँचकर यतिराज ने शिष्यों से कहा— “बोधायन-वृत्ति की प्राप्ति तुम्हारी भक्तिशक्ति और कूरेश की अद्भुत मेधाशक्ति का प्रताप है। अब मैं उन सबका मत खण्डन करूँगा जो केवल ‘अहं ब्रह्मास्मि’ के ज्ञान को ही मुक्ति का उपाय मानते हैं। वेद-वेदान्त का वास्तविक अभिप्राय यह है कि भक्ति, ध्यान और उपासना से ही मुक्ति की प्राप्ति होती है। इसी सिद्धांत को स्थिर करके मैं श्रीभाष्य की रचना करूँगा।”
यतिराज ने कूरेश को लेखक नियुक्त किया और कहा— “जहाँ कोई तर्क ठीक न लगे, तुम लिखना रोक देना, ताकि मैं उस युक्ति को पुनः विचार कर सकूँ।”
एक बार यतिराज ने जीव का स्वरूप केवल ज्ञाता के रूप में कहा, बिना भगवच्छेषता के। यह सुनते ही कूरेश ने लिखना रोक दिया। जब गुरु ने बार-बार कहने पर भी न लिखा, तब यतिराज थोड़े रुष्ट हुए, परंतु तुरंत ही गूढ़ तत्त्व हृदय में उदित हुआ— “जीव स्वतंत्र नहीं; वह सर्वथा ईश्वराधीन, ईश्वर का अंश और शेष है।”
इस सत्य को स्थापित करके कूरेश ने पुनः लेखन आरम्भ किया। और इस प्रकार श्रीभाष्य की रचना पूर्ण हुई।
इसके पश्चात् यतिराज ने चार अन्य ग्रंथ भी रचे—
द्राविड़ प्रबन्धमाला को वेदों के समान प्रतिष्ठित करके उन्होंने श्रीयामुनाचार्य की प्रथम अभिलाषा पूर्ण की, और श्रीभाष्य की रचना करके द्वितीय अभिलाषा।
I am a writer and researcher dedicated to collecting and sharing Hindu stotra, rituals, festivals, and cultural wisdom. My work focuses on preserving and presenting authentic knowledge in a simple, meaningful way.
धनुर्दास और उनकी पत्नी हेमाम्बा की भक्ति, श्रीरामानुजाचार्य की कृपा, गरुड़-महोत्सव में घटनाएँ, गुण और ब्राह्मण धर्म का महत्व।
विशिष्टाद्वैत वेदांत के अनुसार जीव, प्रकृति और परब्रह्म के स्वरूप, कारण और परिणाम, जीवों का तिरोहित स्वरूप, तथा मोक्ष और भक्ति का मार्ग।
श्रीरामानुजाचार्य द्वारा रचित प्रमुख ग्रन्थों का परिचय एवं विवरण। वेदार्थ संग्रह, वेदान्तसार, वेदान्त दीप, श्रीभाष्य, गीता भाष्य, गद्यत्रय, नित्याराधन।
