• 31 Mar, 2026

अष्टम अध्याय – देह-दर्शन | श्रीरामानुज जीवन चरित्र

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भूमिका – देह-दर्शन अध्याय का महत्व

‘देह-दर्शन’ अध्याय श्रीरामानुज के जीवन की अत्यन्त संवेदनशील, हृदयस्पर्शी और ऐतिहासिक घटना को प्रस्तुत करता है। इस अध्याय में गुरु-भक्ति, भक्त–भावना, विरह, दर्शन, संकल्प, धर्म-परम्परा तथा वैष्णव-संप्रदाय के दिव्य मूल्यों का अद्भुत संगम दिखाई देता है।

श्रीमहापूर्ण की काञ्चीपुरी यात्रा

गुरु के चरण-कमलों की आज्ञा पाकर श्रीमहापूर्ण दिन-रात यात्रा करते हुए चार दिन में काञ्चीपुरी पहुँचे। पहुँचकर उन्होंने श्रीवरदराज का दर्शन किया और श्रीकाञ्चीपूर्ण से भेंट की। संध्या का समय था, अतः श्रीकाञ्चीपूर्ण ने उन्हें अपने आश्रम में रात्रि विश्राम करने का आग्रह किया।

प्रातःकाल – श्रीरामानुज के प्रथम दर्शन

अगले दिन प्रातः मंदिर जाते समय उन्होंने दूर से एक दिव्य तेज से प्रकाशित युवा ब्राह्मण को देखा—घड़ा लिए, मृदुभाषी, दयालु, गुणवंत—जो कोई और नहीं बल्कि स्वयं श्रीरामानुज थे।

उन्हें देखते ही श्रीमहापूर्ण के मुख से स्वाभाविक रूप से गुणगान फूट पड़ा—

वशी वदान्यो गुणवानृजुः शुचि-
मृदुर्दयालुर्मधुरः स्थिरः समः।

श्रीरामानुज उनके समीप आए और विनम्रता से उनके द्वारा पढ़े जा रहे अलौकिक श्लोकों के रचयिता के विषय में पूछने लगे। जब उन्हें पता चला कि ये श्लोक श्रीयामुनाचार्य (आलवन्दार) द्वारा रचे गए हैं, तब उनकी आँखों में अत्यधिक श्रद्धा झलक उठी।

श्रीमहापूर्ण का संदेश – श्रीयामुनाचार्य का बुलावा

श्रीमहापूर्ण ने अत्यंत करुणा और प्रसन्नता के साथ कहा कि वे स्वयं महर्षि श्रीयामुनाचार्य की आज्ञा से ही श्रीरामानुज को बुलाने आए हैं। यह सुनकर उनके आनंद का ठिकाना न रहा।

श्रीरामानुज ने कहा— “पहले भगवान् के भक्तों की आज्ञा, उसके बाद घर की चिंता।” वे शीघ्रता से घड़ा रखकर यात्रा के लिए तैयार हो गए।

कावेरी तट पर पहुँचते ही शोक-सूचना

चार दिनों की तीव्र यात्रा के बाद जब वे त्रिशिरःपल्ली (Trichinopoly) पहुँचे, तो उन्होंने भीड़ देखकर कारण पूछा। उत्तर मिला— “महात्मा आलवन्दार ने देह त्याग दिया।”

यह सुनते ही श्रीरामानुज भूमि पर गिर पड़े। श्रीमहापूर्ण भी जोर-जोर से विलाप करने लगे।

आलवन्दार के परम-पवित्र शरीर का अंतिम दर्शन

अंतिम दर्शन हेतु वे दोनों समाधि-स्थान पहुँचे। आसपास शिष्य शांत खड़े थे। श्रीरामानुज की आँखों से अश्रु-धारा बह रही थी। महात्मा आलवन्दार का दिव्य तेज मृत्यु के बाद भी वैसे ही विद्यमान था।

तीन मुड़ी हुई अंगुलियाँ – तीन संकल्प

श्रीरामानुज ने देखा कि आलवन्दार के दाहिने हाथ की तीन अंगुलियाँ मुड़ी हुई थीं। वे बोले—यह तीन संकल्पों का संकेत है।

  1. विष्णु-मत की रक्षा करना — यह कहते ही एक अंगुली सीधी हो गई।
  2. समस्त अर्थों को संग्रह कर ‘श्रीभाष्य’ की रचना करना — दूसरी अंगुली खुल गई।
  3. महर्षि पराशर के ऋण से मुक्त होने हेतु एक महान वैष्णव को उनके नाम से प्रसिद्ध करना — तीसरी अंगुली भी सीधी हो गई।

श्रीरामानुज का कांची लौटना

श्रीयामुनाचार्य के देह-त्याग से द्रवित होकर श्रीरामानुज ने कहा— “जिस भगवान् ने मुझे यह दुख दिया, आज मैं उसी के दर्शन नहीं करूँगा।” और वे कांचीपुर लौट आए।

वहाँ उनका स्वभाव अत्यधिक गंभीर हो गया, वे एकांतवास में रहने लगे। केवल श्रीकाञ्चीपूर्ण उनके एकमात्र सांत्वना-स्रोत थे।

समापन – देह-दर्शन का आध्यात्मिक संदेश

यह अध्याय केवल शोक या वियोग का वर्णन नहीं है, बल्कि यह वैष्णव-परम्परा की महान विरासत, गुरु-शिष्य संबंधों की पवित्रता, और धर्म के संरक्षण हेतु श्रीरामानुज के संकल्पों का अद्भुत साक्ष्य है।

यही ‘अष्टम अध्याय – देह-दर्शन’ का सार और संदेश है।

Hari Krishna Regmi

Hari Krishna Regmi

I am a writer and researcher dedicated to collecting and sharing Hindu stotra, rituals, festivals, and cultural wisdom. My work focuses on preserving and presenting authentic knowledge in a simple, meaningful way.