• 31 Mar, 2026

पंचदश अध्याय – श्रीरङ्गनाथ स्वामी के प्रधान सेवक

पंचदश अध्याय – श्रीरङ्गनाथ स्वामी के प्रधान सेवक

पंचदश अध्याय – श्रीरङ्गनाथ स्वामी के प्रधान सेवक

दक्षिण देश की धार्मिक एवं सांस्कृतिक परम्परा

दक्षिण-देश में मुसलमानों का अत्याचार अपेक्षाकृत कम होने के कारण यहाँ के प्राचीन मंदिर आज भी सुरक्षित हैं। आर्यावर्त की तुलना में यहाँ मंदिरों की संख्या अधिक है। यह भूमि ऋषियों, मुनियों और तपस्वियों द्वारा सेवित है तथा सिन्धु और जाह्नवी के समान पवित्रता प्रदान करने वाले अनेक तीर्थों से युक्त है।

यद्यपि दक्षिण-देश मानवी शिल्प के आधार पर स्वयं को गौरवशाली नहीं मानता, किन्तु प्रकृति स्वयं यहाँ अद्वितीय सौन्दर्य का प्रसाद प्रदान करती है। हिमालय जैसे प्राकृतिक देवालय की तुलना में मानव निर्मित शिल्प सदैव कमतर ही ठहरता है। इसी कारण दक्षिण देश के अनेक मंदिरों के होते हुए भी आर्यावर्त का आध्यात्मिक गौरव सदैव श्रेष्ठ माना जाता है।

श्रीरंगनाथ मंदिर की विशालता

यदि कोई प्राचीन हिन्दू शिल्प-कौशल का वास्तविक दर्शन करना चाहता है तो दक्षिण-देश के मंदिरों को देखे बिना उसकी कल्पना भी नहीं कर सकता। श्रीरंगनाथ मंदिर इतना विशाल है कि पुजारी अपने परिवार सहित मंदिर परिसर के भीतर ही निवास कर सकते हैं।

मंदिर के प्रांगण में खम्भों पर स्थित एक भव्य मण्डप है— इतना बड़ा कि अंग्रेज और फ्रांसीसी युद्ध के समय पूरी फ्रांसीसी सेना का एक भाग उसी मण्डप में आश्रय ले चुका था। इससे मंदिर की अप्रतिम विशालता का अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है।

स्थानिक सेवकों का विरोध और षड्यंत्र

श्रीरामानुजाचार्य के समय मंदिर-प्रबन्ध ‘स्थानिक’ नामक कुछ स्थानीय कर्मचारियों के अधीन था। स्वामीजी मंदिर की पूजा, भोग, उत्सव व्यवस्था आदि में आवश्यक सुधार करते थे। इससे वे स्थानिक उनसे असन्तुष्ट रहते और भीतर-ही-भीतर विद्रोही भाव रखते थे।

उनमें से एक दुराचारी स्थानिक ने स्वामीजी की हत्या का निश्चय किया। श्रीरामानुज प्रतिदिन सात घरों में भिक्षाटन करते थे। उसी में से एक गृहस्थ को लालच देकर उस स्थानिक ने स्वामीजी को विषमिश्रित अन्न देने की योजना बना ली।

साध्वी पत्नी की अंतर्द्वंद्व और स्वामीजी का चमत्कारिक बचाव

गृहस्थ ने लोभ में आकर यह पापकर्म स्वीकार कर लिया, पर उसकी पत्नी ने पति को बार-बार ऐसा न करने की सलाह दी। परंतु पति के न मानने पर वह विवश हुई, किन्तु मन में दृढ़ संकल्प किया कि किसी भी प्रकार स्वामीजी को बचाऊँगी।

जिस दिन स्वामीजी भिक्षा लेने आए, उसने विषमिश्रित भोजन तो दिया पर नियम के विरुद्ध जाकर साष्टांग प्रणाम कर दूर खड़ी हो गई। स्वामीजी भावज्ञ थे। उन्होंने समझ लिया कि अन्न दोषयुक्त है।

उन्होंने गहरा दुःख अनुभव किया कि लोग उन्हें हानि पहुँचाने के लिए इतना पाप क्यों कर रहे हैं। स्वामीजी ने वह अन्न कावेरी में विसर्जित किया और उस दिन उपवास रखा।

श्रीगोष्ठीपूर्ण का आगमन

यह समाचार सुनकर श्रीगोष्ठीपूर्ण श्रीरंगम आए। श्रीरामानुज स्वयं कावेरी तट तक उनके स्वागत के लिए पहुँचे।

प्रखर धूप और तप्त बालुका के बीच श्रीरामानुज ने साष्टांग प्रणाम किया और काफी देर तक उसी स्थिति में पड़े रहे। परन्तु श्रीगोष्ठीपूर्ण ने उन्हें उठने की आज्ञा नहीं दी।

किडाम्बि आच्चान का भाव-विस्फोट

यह देखकर किडाम्बि आच्चान क्रोधित हुए और बोले— “क्या कोमल पुष्पमालाओं को भी कोई तपती धूप में डालता है?” यह कहकर उन्होंने श्रीरामानुज को उठाया और स्वयं उनके चरणों में गिर पड़े।

वे रोते हुए बोले— “मैं दण्ड का पात्र हूँ। मुझे नरक में भेजिए। इस पापी को दण्ड दीजिए, हे दीनशरण!”

वह इतना पछतावा करने लगे कि सिर पटक-पटककर उनका शरीर लहूलुहान हो गया। तभी श्रीरामानुज ने करुणा-वश कहा— “भाई, राक्षसी वृत्ति छोड़ो। श्रीरंगनाथ ने तुम्हारा अपराध क्षमा किया।”

दयामूर्ति श्रीरामानुज का स्पर्श

अर्चक ने रोते हुए कहा— “आपका शरीर दया से बना है। आपने तो पापिनी पूतना तक को मातृलोक दिया है।”

यतिराज ने प्रेमपूर्वक उसके शरीर पर हाथ फेरा। उनके स्पर्श से उसका समस्त संताप दूर हो गया। उसकी पिशाची वृत्ति समाप्त हो गई और उसने देवत्व प्राप्त कर लिया।

Hari Krishna Regmi

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I am a writer and researcher dedicated to collecting and sharing Hindu stotra, rituals, festivals, and cultural wisdom. My work focuses on preserving and presenting authentic knowledge in a simple, meaningful way.