• 31 Mar, 2026

चतुर्विंश अध्याय – कृमिकण्ठ | श्रीरामानुजाचार्य जीवन कथा

चतुर्विंश अध्याय – कृमिकण्ठ | श्रीरामानुजाचार्य जीवन कथा

श्रीरामानुजाचार्य और उनके गुरु श्रीमहापूर्ण के बीच की घटना, शूद्र भक्त का दाह, चोल-राज्य की चुनौती, और कूरेश की अद्वितीय भक्ति का वर्णन।

चतुर्विंश अध्याय – कृमिकण्ठ

श्रीमहापूर्ण और शूद्र भक्त का दाह

एक दिन श्रीरामानुजाचार्य ने सुना कि उनके गुरु श्रीमहापूर्ण ने किसी शूद्र भक्त के मृत शरीर का दाह किया है। इस कार्य को कई ब्राह्मण अनुचित मानकर उसकी निंदा कर रहे थे। यथार्थ जानने के लिए श्रीरामानुज गुरु-गृह पहुँचे। वहाँ उन्हें ज्ञात हुआ कि श्रीमहापूर्ण ने भक्त की सेवा में अपने सारे सांसारिक मोह त्याग दिए थे। उन्होंने बताया कि जो भक्त मुझसे सहस्त्र गुणा अधिक भगवद्भक्तिपरायण थे, उनका सेवा और दाह करना मेरा धर्म था। यह सुनकर श्रीरामानुज अत्यंत प्रसन्न हुए।

शिष्य के लक्षण और गुरु का मार्गदर्शन

श्रीमहापूर्ण ने यह शिक्षा दी:

"गुरुणोक्त प्रकारेण वर्त्तनं शिष्यलक्षणात्। अतस्तेनोक्त मार्गेण वते अहं वैनचान्यथा।"

अर्थात्, गुरु के निर्देशानुसार चलना ही शिष्य का मुख्य लक्षण है। शिष्य को स्वतन्त्रता नहीं, बल्कि पूर्ण समर्पण के साथ गुरु-परायण होना चाहिए। यह दृश्य सभी शिष्यों के लिए एक महान शिक्षा बन गया कि भक्ति और अनुशासन ही वास्तविक धर्म हैं।

 

श्रीयामुनाचार्य का ध्यान और गुरु के प्रति श्रद्धा

श्रीगोष्ठीपूर्ण अपने गुरु श्रीयामुनाचार्य के चरणकमलों को अपने ध्यान का केंद्र मानते थे। श्रीरामानुज ने देखा कि उनका गुरु उनके लिए नारायण से भी अधिक प्रिय हैं। यह देख कर श्रीरामानुज का गुरु के प्रति सम्मान और श्रद्धा अत्यंत बढ़ गई।

चोल-राज्य की चुनौती और कूरेश की भक्ति

चोल-देश के राजा ने श्रीरामानुज को अपने राज्य में बुलाकर शैव मत ग्रहण करने का प्रयास किया। यदि वे वैष्णव मत छोड़ देते, तो सम्पूर्ण चोलमंडल शैव बन जाता। श्रीरामानुज ने अपने शिष्य कूरेश को काषाय वस्त्र पहनाकर स्वयं मठ में छुप जाने का निर्णय लिया और कूरेश ने उनके वस्त्र धारण कर चोलराज के सामने उपस्थित हुए।

शास्त्रार्थ और चोलराज का क्रोध

कूरेश ने निर्भय होकर शास्त्र और धर्म का समर्थन किया। राजा और उनके पंडित उससे शास्त्रार्थ करने लगे, किंतु कूरेश भयमुक्त और उत्साहित थे। उनकी दृढ़ भक्ति और गुरु के प्रति समर्पण देखकर राजा अत्यंत क्रोधित हुआ और नेत्रों को निकालने का आदेश दिया। कूरेश ने स्वयं अपने नेत्र निकाल दिए और इसके बावजूद उनका मन शांति और भक्ति में स्थिर रहा।

कूरेश की स्थिरता और सच्ची भक्ति

कूरेश की निर्भयता और गुरु के प्रति अडिग भक्ति सभी के लिए प्रेरणा बन गई। उनके शुद्ध चित्त ने पाषाण-तुल्य राजपुरुषों के हृदय में भय और भक्ति उत्पन्न किया। राजा और पंडित उन्हें अधिक प्रताड़ित नहीं कर सके। कूरेश को सुरक्षित श्रीरंगम ले जाया गया और मार्ग में ही श्रीमहापूर्ण परमपद को प्राप्त हो गए।

चोलराज का अंत और कृमिकण्ठ उपाधि

थोड़े ही दिनों के बाद चोलराज को कण्ठमाला रोग हो गया और उसमें कृमि पड़ गए। अत्यंत दुःख भोगकर उसका निधन हो गया और इसी कारण उसे कृमिकण्ठ के नाम से जाना गया। इस अध्याय से स्पष्ट है कि सच्ची भक्ति, गुरु-भक्ति और धर्म का पालन ही जीवन में सर्वोच्च सुरक्षा और कल्याण का मार्ग है।

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Hari Krishna Regmi

Hari Krishna Regmi

I am a writer and researcher dedicated to collecting and sharing Hindu stotra, rituals, festivals, and cultural wisdom. My work focuses on preserving and presenting authentic knowledge in a simple, meaningful way.