द्वादशदिव्य सूरी और दस पूर्वाचार्य
द्वादश दिव्य सूरी और दस पूर्वाचार्यों के नाम और विवरण। श्रीरामानुजाचार्य के प्रमुख शिष्यों और आलवारों की नामावली।
एकोनत्रिंश अध्याय में श्रीरामानुजाचार्य की मूर्तिप्रतिष्ठा, शिष्यों की भक्ति, गुरु-विरह, और उनके जीवनकाल की घटनाओं का विस्तृत वर्णन।
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श्रीरामानुजाचार्य जब श्रीरंगम में आने के लिए यादवाद्रि से प्रस्थान कर रहे थे, तब उनके शिष्य उनके विरह से व्याकुल हो गए। यतिराज ने अपनी मूर्ति बनाकर उसमें अपनी शक्ति संक्रान्त कर दी और कहा: "प्रियगण, तुम लोग हमारी मूर्ति को हमारा ही स्वरूप जानो। इसका दर्शन करने से तुम्हें शान्ति प्राप्त होगी।" इसके पश्चात वे भक्तों से विदा हुए।
उनके जन्मभूमि के भक्तों ने यतिराज की मूर्ति बनवाकर वेद-विधि अनुसार प्रतिष्ठा की और विशाल मंदिर में स्थापित किया। शिष्य इस मूर्ति के दर्शन से अत्यंत सौभाग्यशाली समझे गए। श्रीरामानुजाचार्य ने अपने जीवन के शेष साठ वर्ष श्रीरंगनाथ स्वामी के चरणों में बिताए। दूर-दूर से भक्त उनके दर्शन और अमृतोपम वचन सुनने आते थे।
यतिराज ने अपने शिष्यों के कहने पर तीन दिन और उनके साथ रहने का निश्चय किया। इस दौरान उन्होंने उपदेश-रत्नमाला दी, जो लौकिक रत्नों से कई गुणा अधिक मूल्यवान थी। इन रत्नों के माध्यम से शिष्यगण और संपूर्ण जगत् कृतकृत्य हुए। यतिराज ने शिष्यों से कहा: "भागवत् भक्त और भगवान एक ही हैं। तुम लोग मेरे भीतर और मैं तुम्हारे भीतर सर्वदा उपस्थित हूँ।"
दाशरथि, गोविन्द, आन्ध्रपूर्ण आदि शिष्य बोले: "जिन चरणों के स्पर्श से अनेक जीव मुक्त हुए हैं, वही चरण नश्वर कैसे हो सकते हैं? हमें उनका दर्शन सतत रूप से चाहिए।" यतिराज ने निर्देश दिया कि निपुण शिल्पियों से मूर्ति बनवाई जाए। तीसरे दिन मूर्ति तैयार की गई और कावेरी जल में स्नान कर पीठ पर स्थापित किया गया। उन्होंने उसमें अपनी शक्ति संक्रान्त कर दी और शिष्यों को बताया: "यह हमारा दूसरा रूप है। इसमें किसी प्रकार का भेद नहीं है।"
शिष्य गोविन्द और वैष्णव पराशरभट्ट ने यतिराज की छाया के आश्रय में धर्मसंस्कार कार्यों में भाग लिया। भक्ति के बल से शिष्यगण अपने हृदय में गुरु का दर्शन पाकर विरह के ताप से रक्षित हुए। यतिराज ने अपने जीवनकाल में शिष्यों को ज्ञान, भक्ति और सेवा के मार्ग में पूर्ण रूप से मार्गदर्शन दिया।
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