• 29 Mar, 2026

भगवान भाष्यकार द्वारा जीवों की मुक्ति के उपाय, उपदेश और मार्गदर्शन। मोक्षकामी वैष्णवों के लिए संपूर्ण निर्देश।

भगवान भाष्यकार के मोक्ष उपाय

भगवान् भाष्यकार अत्यन्त कृपालु थे। वे जीव मात्र की सद्गति की कामना रखते थे। अतः वैकुंठ यात्रा करने के पूर्व आपने अपने शिष्यों को गागर में सागर भरने के समान कुछ ही शब्दों में जीव की मुक्ति के उपाय बतलाये थे, जो यहाँ उद्धृत किये जाते हैं। मोक्षकामी जीवों को इन उपायों को व्यवहार में ला अपना जीवन धन्य करना चाहिए।

उद्धृत श्लोक

  1. उपाय बुद्धया कर्माणि मा कुरुध्वं महात्मकाः कर्मणामेव कैंकर्य प्राप्ये भागवतो मति ॥१॥
  2. तदीयं नाम कैंकर्य श्रुत्वा श्री भाष्यमादरात्। प्रयतंयध्वं तल्लोके तत्र शक्तिर्नचेद्यदि ॥२॥
  3. पराँकुशादि मुनिभिर्दशभिर्दशिकोत्तमैः। कृतं प्रबन्धमभ्यस्य शिष्येभ्योवदता निशम्।।३।।
  4. तत्रापि भवतां शक्तिर्न स्याद् यदि वैष्णवाः। दिव्य देशेषु कैंकर्य विष्णवे कुरुता निशम्।।४।।
  5. तत्रापि भवतां बुद्धिर्यदि सम्यक् न जायते। कुटीरमपि कृत्वापि मठे में यादवाचले। मुक्तांकारिणः सर्वे वासं कुरुत वैष्णवाः ॥५॥
  6. नाप्येतद्भवतां वत्स रोचते यदि सुन्दरम्। द्वयार्थस्यानुसन्धानं यावज्जीवमतक्रिताः।।६।।
  7. कुर्वन्ति सम्यगेवापि निर्भरावसनादरात्। यदि नोत्पद्यते बुद्धि भवतां तत्र सत्तमाः। श्रूयतामवथानेन प्रवक्ष्ये चरमं हितम् ॥७॥
  8. ज्ञान भक्त्यादि मुक्तस्य वैष्णवस्य महात्मनः। मुक्ताहंकारिणस्तस्य निदेशे वसता निशम्। अयं हि चरमोपायो नन्योपायस्ततः परम्।।८।।

उपदेश का सारांश

हे श्री वैष्णवो! किसी कार्य की सिद्धि का उपाय या साधन समझ कोई भी कार्य मत करना, प्रत्युत यह समझ कर करना कि भगवत् प्राप्ति भगवत् कैंकर्य ही से होगी।

तदीय जनों अर्थात् भागवतों का नाम कीर्तन और उनकी सेवा सुश्रूषा होनी भगवद् प्राप्ति होती है। आप लोग श्री भाष्य को सादर सुनना और भूमंडल पर उसका प्रचार करना। यदि ये कार्य आप न कर सकें तो श्री शठकोपादि महात्माओं के रचे प्रबन्ध एवं देशिकोत्तमों "दस पूर्वाचायों के रचे" ग्रन्थों को स्वयं पढ़कर अपने शिष्यों को सदा पढ़ाते रहना।

हे वैष्णवो! यदि यह भी न कर सको तो दिव्य देशों में जा भगवान विष्णु का कैंकर्य ही किया करना। यदि इस काम में भी आपका मन न लगे तो हे भागवतो! लोकेषणा एवं आत्माभिमान को त्याग यादवाचल मैलकोटा के हमारे मठ के समीप कुटिया या झोपड़ी बना कर निवास करना (यादवाचल महात्म्यानुसार यादवाद्रि में केवल देहावसान पर्यन्त रहने ही से जीव को मोक्ष प्राप्ति होती है)।

हे वत्सों! यदि आप लोगों को यह भी न अच्छा लगे तो आलस्य त्याग कर जन्म भर श्रद्धा एवं विश्वासपूर्वक द्वय मंत्र का अनुसन्धान करते हुए जहाँ चाहो वहाँ ही रहना।

अन्त में भाष्यकार भगवान चाहते हैं, हे भागवतों! यदि आपका मन इस काम में भी न लगे तो अब मैं कहता हूं उसे सावधान होकर सुन कर तदनुसार ही जीवन के दिन पूरे करना। यह मेरा परम हितकर उपदेश है।

ज्ञानभक्ति से युक्त और अहंकारादि से रहित महाभागवतों के आदेशों का पालन करते हुए जीवन के दिन पूरे करो, यह परमोत्कृष्ट साधन है, इससे बढ़ कर अन्य कोई साधन नहीं है।

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Hari Krishna Regmi

Hari Krishna Regmi

I am a writer and researcher dedicated to collecting and sharing Hindu stotra, rituals, festivals, and cultural wisdom. My work focuses on preserving and presenting authentic knowledge in a simple, meaningful way.