• 02 Apr, 2026

त्रयोदश अध्याय - श्रीरामानुजाचार्य और श्रीगोष्ठीपूर्ण

त्रयोदश अध्याय - श्रीरामानुजाचार्य और श्रीगोष्ठीपूर्ण

श्रीरामानुजाचार्य की कथा

त्रयोदश अध्याय: श्रीगोष्ठीपूर्ण

श्रीरामानुजाचार्य श्रीरंग क्षेत्र में आने पर श्रीमहापूर्ण को अपना गुरु पाकर श्रीयामुनाचार्य के अभाव से उत्पन्न शोक को भूल गए। उन्होंने आदर्श शिष्यों की भांति व्यवहार करके शिष्य-कर्तव्य की शिक्षा दी।

"शरीरंक्सु विज्ञानं वासः कर्मगुणानसून्। गुर्वर्थ धारयेद्यस्तु सशिष्यो नेतरः स्मृतः।"

अर्थात, जो शरीर, धन, ज्ञान, वसन, कर्म, गुण और प्राण गुरु के लिए धारण करते हैं, वे ही सच्चे शिष्य हैं।

श्रीरामानुजाचार्य ने श्रीमहापूर्ण के निकट गीताथ-संग्रह, सिद्धित्र, व्याससूत्र, पंचरात्रागम आदि का अध्ययन किया। उनकी प्रतिभा देखकर श्रीमहापूर्ण ने अपने पुत्र पुण्डरीक को उनका शिष्य बनवाया।

गोष्टिपुर में गोष्ठीपूर्ण से मिलन

श्रीमहापूर्ण ने कहा: "वत्स! तिरुक्कोटियूर अथवा गोष्ठीपुर नामक ग्राम में गोष्ठीपूर्ण नामक एक परम धार्मिक विद्वान् रहते हैं। उनके पास श्रीयामुनाचार्य द्वारा उपदेशित रहस्यार्थ-विशेष हैं।"

श्रीरामानुजाचार्य उसी समय गोष्ठीपुर गए और गोष्ठीपूर्ण से मिलने का प्रयास किया। पहले प्रयास में उन्हें अनुमति नहीं मिली। दुःखित होकर उन्होंने अपने स्थान पर लौटकर प्रतीक्षा की।

अंततः, गोष्ठीपूर्ण ने अपने शिष्य के माध्यम से उन्हें बुलाया और रहस्यमंत्रोपदेश देने से पहले कहा:

"एक विष्णु के अतिरिक्त दूसरा इस माहात्म्य को नहीं जानता। मैं तुम्हें इसके अत्यन्त योग्य समझता हूँ। अतः इस मन्त्र को किसी को न देना। जो इसे सुनेगा, वह शरीरान्त होने पर मुक्ति प्राप्त करके वैकुण्ठ धाम जाएगा।"

श्रीरामानुजाचार्य गुरु-वचन सुनकर आनंदित हुए। मंत्र-बल से उन्हें दिव्य ज्ञान प्राप्त हुआ। उनका मुखमण्डल अलौकिक शोभा धारण कर गया। उन्होंने बार-बार गुरु के चरणों को प्रणाम किया और अपने हृदय को कृतार्थ समझा।

महामंत्र का उपदेश और नगरवासियों का आनंद

श्रीगुरु से विदा लेकर श्रीरामानुजाचार्य श्रीरंगम् की ओर प्रस्थान किए। मार्ग में उन्होंने नगरवासियों को महामंत्र का उपदेश दिया। सभी ने मंत्र का उच्चारण तीन बार किया और स्थिर हुए।

महामंत्र के प्रभाव से नगरवासियों में आनंद और श्रद्धा का संचार हुआ। भूखा मनुष्य जैसे बड़े आग्रह से अन्न ग्रहण करता है, उसी प्रकार नगरवासी महामंत्र से दिव्यानंद प्राप्त कर रहे थे।

श्रीरामानुजाचार्य की दिव्य शोभा और कृपा देखकर नगरवासियों ने उन्हें साष्टांग प्रणाम किया और अपने को कृतार्थ समझा।

शिष्यों के साथ गुरु श्रीगोष्ठीपूर्ण की पूजा

श्रीरामानुजाचार्य ने अपने शिष्यों के साथ गुरु श्रीगोष्ठीपूर्ण की पूजा करने उनके घर की ओर प्रस्थान किया। गुरु की आज्ञा और दिव्य शक्ति देखकर सभी स्तम्भित हो गए।

श्रीगोष्ठीपूर्ण ने अपने पुत्र सौम्यनारायण को श्रीरामानुजाचार्य के शिष्य रूप में अर्पित किया। इस प्रकार, श्रीरामानुजाचार्य ने रहस्यार्थ और दिव्य ज्ञान प्राप्त कर, अपने शिष्यों के हृदय में श्रद्धा और प्रेम का संचार किया।

श्रीरामानुजाचार्य की यह कथा वैष्णव मार्ग और गुरु-शिष्य परंपरा में अद्वितीय उदाहरण मानी जाती है।

Hari Krishna Regmi

Hari Krishna Regmi

I am a writer and researcher dedicated to collecting and sharing Hindu stotra, rituals, festivals, and cultural wisdom. My work focuses on preserving and presenting authentic knowledge in a simple, meaningful way.